आगामी लोकसभा चुनाव से ठीक पहले माकपा ने गैर एनडीए-गैर यूपीए दलों को एक साथ लाने की मुहिम की शुरुआत की है। पार्टी महासचिव प्रकाश करात की योजना धर्मनिरपेक्षता के नाम पर फिर से राजनीति में तीसरा विकल्प खड़ा करने की है।
इसी कड़ी में दागी सांसदों और विधायकों को बचाने वाले अध्यादेश पर जारी राजनीतिक गहमागहमी के बीच करात ने सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से मुलाकात की।
दोनों नेताओं के बीच इस अध्यादेश के कारण उत्पन्न स्थिति के साथ ही गैर एनडीए-गैर यूपीए दलों को जोड़ने के लिए आगामी 30 अक्तूबर को दिल्ली में बुलाए जा रहे राष्ट्रीय अधिवेशन पर विस्तार से बातचीत हुई। धर्मनिरपेक्षता को बचाने के बहाने बुलाए जा रहे अधिवेशन के लिए करात जदयू, बीजद, जद(एस) सहित गैर एनडीए-गैर यूपीए के कई दलों के नेताओं को आमंत्रित कर रहे हैं।
भाजपा के गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने के फैसले ने माकपा को तीसरा विकल्प खड़ा करने का अवसर दिया है। पहले वाम दल कांग्रेस की आर्थिक नीतियों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरने के पक्ष में थे।
मोदी के सामने आने के बाद बदली परिस्थितियों में वाम दलों को लगा कि कांग्रेस की आर्थिक नीतियों की खिलाफत के बदले धर्मनिरपेक्षता के नाम पर गैर एनडीए-गैर यूपीए दलों को एकजुट करना आसान होगा। इसके अलावा वाम दलों के सामने तृणमूल कांग्रेस ने फेडरल फ्रंट के गठन की घोषणा ने मुश्किलें खड़ी की थी।
माकपा सूत्रों का कहना है कि आगामी 30 अक्तूबर को होने वाला राष्ट्रीय अधिवेशन धर्मनिरपेक्षता बचाने के नाम पर होगा। अधिवेशन में धर्मनिरपेक्ष ताकतों के लिए एक साझा कार्यक्रम अपनाने का एजेंडा तैयार करने की कोशिश की जाएगी।
चूंकि हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा हो चुकी है, इसलिए इस अधिवेशन का महत्व बढ़ गया है। उधर दोनों नेताओं की मुलाकात में दागियों से संबंधित अध्यादेश पर भी गंभीर चर्चा हुई। मुलायम इस अध्यादेश के समर्थन में थे।
उनका कहना था कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से क्षेत्रीय दलों की भविष्य में राजनीतिक राह कठिन होगी।