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पेरिस हमला बदल सकता है जी-20 शिखर सम्मेलन का एजेंडा

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फ्रांस की राजधानी पेरिस में आतंकी हमले ने विश्व की महाशक्तियों की नींद उड़ा दी है। इसे न्यूयार्क में ट्विन टावर पर हुए आतंकी हमले की तरह महत्वपूर्ण और मुंबई में 26 नवंबर 2008 को हुए हमले जैसा माना जा रहा है। इसके चलते तुर्की के अंतालिया में हो रहे जी-20 शखिर सम्मेलन के मुख्य एजेंडे में बदलाव के पूरे आसार हैं। अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन समेत तमाम देश आतंकवाद के खिलाफ ठोस लड़ाई को जारी रखने का संकल्प दोहरा सकते हैं और आतंकवाद के मुख्य मुद्दा उभर कर आने की उम्मीद है।
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अमेरिका में भारत के पूर्व राजदूत रहे नरेश चंद्रा का का कहना है कि फ्रांस में हमला ‘घर में हमले’ की तरह है। इसे पश्चिमी देशों में एक बड़ी चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है। इसलिए जी-20 शिखर सम्मेलन में आतंकवाद को लेकर जोरदार चर्चा हो सकती है। आतंकवाद से निबटने को लेकर भी काफी हद तक स्थिति साफ हो सकती है। हालांकि चंद्रा का मानना है कि समय काफी कम है, इसलिए नीतिगत निर्णय के आसार नहीं है, लेकिन पूरा जी-20 शिखर सम्मेलन इससे प्रभावित होना तय है। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि पेरिस पर हमले को लेकर रूस, अमेरिका और अन्य देशों की आतंकवाद से लड़ने की दोहरी नीतियों की खिंचाई कर सकता है।

भारत भी लगातार पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से पीड़ित रहा है और इस मुद्दे पर विशेष तौर से चर्चा में भाग ले सकता है। चंद्रा का मानना है कि सीरिया में आईएसआईएस और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई काफी उलझ गई है। रूस जहां असद सरकार को समर्थन दे रहा है, वहीं अमेरिका आईएसआईएस के खिलाफ कार्रवाई तथा असद सरकार के दूसरे विद्रोही गुट को प्रशिक्षण, समर्थन तथा हथियार उपलब्ध करा रहा है। इसलिए काफी हद तक संभावना है कि आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध को लेकर एक समान नीति अपनाने की मांग जोर पकड़े। अच्छे और बुरे आतंकवाद की दलील को सदस्य देश कठघरे में खड़ा कर सकते हैं।
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आखिर फ्रांस पर ही हमला क्यों?

फ्रांस अमेरिका फौज के साथ आतंकवाद और चरमपंथी इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध हर लड़ाई में शरीक रहा है। हाल में ही उसने आईएसआईएस से लड़ने के लिए एयर क्राफ्ट कैरियर और अत्याधुनिक पोत भेजने की घोषणा की। फ्रांस माली, लीबिया, इराक, सीरिया में भी अमेरिकी फौज के साथ संयुक्त कार्रवाई में शामिल रहा है। दूसरे यूरोपीय देशो में सबसे अधिक मुसलमान(56 लाख) फ्रांस में ही हैं। इसके अलावा फ्रांस ने जेहादियों से लड़ने के लिए 10 हजार सैनिकों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तैनाती भी की है। यही वजह है कि 2015 में फ्रांस में शार्ली हेब्दो के दफ्तर समेत दो अन्य आतंकी हमले हो चुके हैं।

फ्रांस के सामने जमीन स्तर पर कई चुनौतियां हैं जिनमें आईएसएस के विरूद्ध सैन्य कार्रवाई के लिए जमीन पर फौज उतारने जैसी कई चुनौतियां शामिल हैं। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे देश इससे परहेज करने लगे हैं। इसमें जहां सैनिकों की हानि होती है, वहीं खर्च काफी बढ़ जाता है। जमीन पर एक सैनिक का साल भर का खर्च करीब 1 मीलियन डॉलर आता है। जबकि बिना जमीन पर फौज उतारे आतंका का हवाई हमले या ड्रोन हमले से सफाया संभव नहीं।

सीरिया के शरणार्थियों के भेष में आतंकियों के घुसपैठ की आशंका पहले ही जताई जा रही थी। कुछ अवांछित लोग पकड़े भी गए हैं। ऐसे में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान सीरिया से जान बचाकर भाग रहे लोगों को शरण देने के मुद्दे पर इसका असर पड़ना तय है। इससे शरणार्थी समस्या के जटिल होने के आसार हैं।
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