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आतंकवाद के खिलाफ मोदी की आवाज हुई बुलंद

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दुनिया को अच्छे और बुरे आतंक में कोई फर्क नहीं करने की भारत की लगातार चेतावनी पर अब तक कनखियों से झांक रहे बड़े देशों को पेरिस पर हुआ हमला जरूर झकझोरेगा। तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद की वैश्विक परिभाषा तय कर इसके खिलाफ एक स्वर और ताकत के साथ जंग लड़ने की बात प्रधानमंत्री मोदी लगातार उठाते आ रहे हैं। पेरिस में हुए आतंकी हमले के चौबीस घंटे पहले भी मोदी ने अपनी ब्रिटेन यात्रा के दौरान ब्रिटिश संसद में इसको लेकर दुनिया को खरी-खरी सुनाई थी।
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भारतीय सुरक्षा और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि मुंबई के 26/11 आतंकी हमले की तर्ज पर फ्रांस में हुए बर्बर आतंकी हमलों के बाद दुनिया के लिए मोदी और भारत की आवाज को लंबे समय तक अनुसना करना मुश्किल होगा। कूटनीतिक विशलेषकों की राय में पेरिस हमले से चौबीस घंटे पहले ब्रिटेन की संसद तो महज तक चंद घंटे पूर्व वेम्बली स्टेडियम में भारतीय समुदाय से रुबरू होने के दौरान मोदी का आतंकवाद को विश्व की सबसे गंभीर चुनौती बताना महज संयोग नहीं। बल्कि यह दर्शाता है कि आतंकवाद किस पल किसके लिए खतरा बन जाए इसको लेकर दुनिया इसको लेकर आश्वस्त नहीं रह सकती। रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञ सी उदय भाष्कर कहते हैं कि आतंकवाद के खूंखार स्वरुप ने देश ही नहीं अब महादेशीय सीमाओं को भी लांघ लिया है। ऐसे में जिम्मेवार राष्ट्र आतंकवाद के खिलाफ खुलकर सामने आने में अपना फायदा और नुकसान देखेंगे तो यह उनकी भारी भूल होगी। भारत के खिलाफ आतंकवाद का भरन-पोषण कर संसाधन मुहैया कराने वाले पाकिस्तान में आतंक के मंजर का उदाहरण सबके सामने है।
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आतंकवाद के बहाने एक-दूसरे पर निशाना

इस लिहाज से ब्रिटेन की संसद में आतंकियों को पनाह देने वालों को अलग-थलग करने की मोदी की आवाज को पेरिस हमले के बाद ज्यादा तवज्जो मिलेगी। गौरतलब है कि इस दौरान मोदी ने आतंकी गुटों व इन्हें प्रश्रय देने वाले राष्ट्रों में कोई फर्क नहीं करने की बात भी कही थी।

इससे पूर्व सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन में मोदी ने आतंकवाद की वैश्विक परिभाषा स्पष्ट तौर पर तय करने की पूरजोर वकालत की थी। तो अपनी इसी अमेरिका यात्रा के दौरान मोदी ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से भी स्पष्ट कहा था कि संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के खिलाफ एक समग्र संधि को अविलंब अंतिम रुप दिया जाना चाहिए।

आतंकवाद के खिलाफ समग्र वैश्विक मुहिम की भारत की आवाज के बावजूद बड़े राष्ट्रों की अब तक जबानी जमा खर्च तक ही सीमित रहने पर रॉ के पूर्व प्रमुख आरएस दुल्लत कहते हैं कि इसमें बड़े देशों की आपसी प्रतिस्पर्धा इसमें बड़ी बाधा है। अमेरिका और रुस इसके उदाहरण हैं जो आपसी प्रतिद्वंदिता में सीरिया में आतंकवाद के बहाने एक दूसरे पर निशाना साध रहे। सुरक्षा मामलों के जानकार अजय साहनी भी कहते हैं कि पेरिस में आतंक की बर्बरता के बाद यूरोप कम से कम इसके खिलाफ एकजुट होगा और ऐसे में अमेरिका को भी मुखर होना पड़ेगा।
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