भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त अब्दुल बासित पाकिस्तान की बदलती तस्वीर पेश करते हैं। बासित के मुताबिक पाकिस्तान में लोकतंत्र मजबूत हुआ है। उनका कहना है कि भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते पाकिस्तान के हक में नहीं हैं। इस पर पाक सेना की भी सहमति है। विशेष संवाददाता गुंजन कुमार के साथ बातचीत में बासित ने एनएसए स्तर की कोशिशों को लिटमस टेस्ट माना है। पेश है प्रमुख अंश
प्रश्नःपठानकोट हमले के बाद दोनों देश आतंकवाद से साझा मोर्चे का संकेत दे रहे हैं। फिर भी एक अविश्वास का माहौल है कि अगर एक भी आतंकी हमला हो गया तो सारी कोशिशें धरी रह जाएंगी। क्या नवाज शरीफ सरकार यह गारंटी दे सकती है कि अब भारत की जमीन पर आतंकी हमला नहीं होगा?
उत्तरःपाकिस्तान खुद दहशतगर्दी का शिकार है। हमने आतंकवाद के खिलाफ जर्ब-ए-अब्ज प्रोग्राम शुरू किया है। यह सफल भी है। लेकिन खुद यह गारंटी नहीं दे सकते कि पाकिस्तान में भी टेरर अटैक नहीं होंगे। आतंकवाद के खिलाफ हम दोनों मुल्कों ने मिलकर काम करना है। हमें इत्मीनान है कि पठानकोट के बाद दोनों मुल्कों ने फैसला किया कि यह मसला मिल कर हल करेंगे। दोनों मुल्कों को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) इसपर काम कर रहे हैं। दोनों तरफ एक पॉजीटिव माहौल है।
प्रश्नःक्या पाकिस्तान की सेना नवाज शरीफ सरकार के साथ है? क्या पाकिस्तान लोकतंत्र की मजबूती इस मुकाम पर पहुंच गई है कि वहां की आवाम भी सेना पर सवाल खड़े करे? नवाज शरीफ कारगिल को अटल बिहारी वाजपेयी की पीठ में छुरा घोंपने संबंधी बयान देकर क्या संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं?
उत्तरः पाकिस्तान अब 1990 वाला पाकिस्तान नहीं। अब हमारे यहां एक राष्ट्रीय सहमति (नेशनल कन्सेंसस) है कि भारत के साथ अच्छे रिश्ते कायम हों। हमारे 2013 के चुनावी एजेंडे को देंखें तो पाएंगे कि तमाम जमात भारत के साथ रिश्ते बेहतर करने की बात करते हैं। इस नेशनल कन्सेंसस में आर्मी भी शामिल है। जनता के साथ आर्मी भी चाहती है कि भारत के साथ रिश्ते ठीक हों। हमारी आर्मी तो पहले से मशरुफ है। अफगानिस्तान बार्डर पर हमने डेढ लाख की फौज तैनात कर रखी हैं। हमारा कोई फायदा नहीं है भारत के साथ रिश्ते बिगाड़ कर रखने में।