प्रधानमंत्री के बुरे दिन खत्म होने के जुमले के पीछे 10 कारण क्या है?
1- नरेंद्र मोदी ने लोकसभा चुनाव के दौरान मतदाताओं को अच्छे दिन आने का वायदा इतनी बार दोहराया कि वो अपने आप में मुहावरा बन गया। भाजपा संगठन में निचले स्तर तक इस वाक्य को चुनावी प्रचार के रूप में लिया गया। सरकार बनने के लगभग तीन महीने तो विपक्ष में कांग्रेस चुप रही। लेकिन बाद में कांग्रेस ने इसी जुमले पर भाजपा का मजाक उड़ाना शुरू किया कि अच्छे दिन नहीं आए। मोदी ने बहुत चतुराई से अच्छे दिन के बजाय बुरे दिन चले गए की बात कही।
2- भाजपा को इस बात का अहसास है कि एक साल में कुछ चीजें अगर उनके पास कहने के लिए हैं तो कुछ कमियां भी हैं। जमीन अधिग्रहण, काले धन की वापसी पर सरकार बहुत ठोस तरीके से अपनी बात नहीं कह पाई। इसलिए बुरे दिन चले गए की थीम यह है कि अभी तो हमने कांग्रेस के समय की स्थितियों को ही ठीक करने में ऊर्जा लगाई हैं। बड़ी मुश्किल से वो चीजें दूर हुई है। अब तो जो था उससे हम बाहर आ रहे हैं।
3- इस वाक्य के बहाने भाजपा को फिर कांग्रेस पर आरोप लगाने का बहाना मिला है। अगर सीधे-सीधे आलोचना की जाती तो कहा जाता कि एक साल बाद भी कांग्रेस को कोसने का क्या मतलब। आखिर अब तो भाजपा की सरकार है। वह चतुराई से कह गए कि बुरे दिन चले गए। यानी कांग्रेस के समय बुरे दिन थे। जो अब खत्म हो गए हैं।
4- इस वाक्य के साथ देश की जनता को आश्वस्त करने की कोशिश की गई है कि सरकार एक साल तक बैठे नहीं रही। बल्कि बहुत कुछ ऐसा किया गया जिससे बुरे दिन चले गए। अच्छे दिन की शुरुआत हुई है।
5- इस बहाने अच्छे दिन के जुमले पर ब्रेक लगाया गया है। बुरे दिन की बात कहकर लोगों को फिर से याद दिलाने की कोशिश की गई है कि कांग्रेस के शासन में किन स्थितियों से गुजरना पड़ा था।
6- लोगों को यह बताने की कोशिश की गई कि भाजपा के नेतृत्व में यह सरकार अच्छे दिनों के लिए लालायित है। बुरे दिनों को खत्म करने के लिए प्रयासरत रही है। फील गुड कराने का अलग अंदाज है।
7- इस बहाने कहा जा रहा है कि भाजपा ने बेहतर ढंग से शासन किया। इतने सालों की बुराई एक साल में ही दूर कर दी गई।
8- लोग अच्छे दिनों को लेकर सवाल न करे इसलिए चर्चा बुरे दिनों के खत्म होने पर रहे।
9- कांग्रेस को बैकफुट में डालने की कोशिश। वह अच्छे दिनों के जुमले के बजाय बुरे दिन खत्म होने की बात पर उलझती हुई दिखे।
10- इस बात की कोशिश कि बुरे दिनों की बात केवल कांग्रेस पर ही नहीं उनके सहयोगियों पर भी असर करे। बिहार चुनाव में भी इस वाक्य को दोहराया जाएगा कि केंद्र में बुरे दिन खत्म हुए। बिहार में भी बुरे दिन जाएंगे।