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क्या फ्रांस लगा पायेगा भारत की परमाणु भट्ठियों में आग?

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फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद भारत के गणतंत्र दिवस पर खास मेहमान बन कर आए हैं। इससे जुड़ा सम्मान, परेड और सांकेतिकता वगैरह तो अपनी जगह हैं, पर अहम सवाल यह है कि उनके एजेंडे में भारत कहां फिट बैठता है? इस दौरान जो व्यावहारिक काम जल्द हो सकता है, वह लड़ाकू हवाई जहाजों और परमाणु भट्ठियों पर सौदे के लिए समझौते।
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इसके लिए लंबे समय से बातचीत चल रही है। इन दोनों मुद्दों पर ही लगभग 30 अरब डॉलर के समझौते हो सकते हैं। लेकिन यदि ये बातचीत और लंबी चलती है तो समझौते को अंतिम स्वरूप देने में काफी वक्त लग सकता है और अंत तक समझौता टल सकता है। ये दोनों ही समझौते ओलांद के लिए काफी अहम हैं। इन समझौतों के जरिए वे अपने देश में राजनीतिक रूप से ताकतवर व्यापारी समुदाय के साथ खड़े दिख सकते हैं।

इसके अलावा हजारों हुनरमंद लोगों को रोजगार भी मिल सकता है। फ्रांस के राष्ट्रपति ने कसम खाई थी कि 'यदि वे देश का विकास करने में नाकाम रहे, रोजगार के मौके नहीं बना पाए और देश को पटरी पर वापस लाने में सक्षम साबित नहीं हुए' तो अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे। इसलिए रोजगार, निवेश और विकास में बढ़ोतरी उनके खुद के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है।
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ज्यादा रक्षा उपकरण बेचना चाहता है

ओलांद के शासनकाल में बेरोजगारी 9।7 फीसदी से बढ़ कर 10।1 प्रतिशत हो गई है, जिसका बुरा असर युवाओं पर कुछ ज्यादा ही पड़ा है। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि उन्होंने इसी महीने आर्थिक आपातकाल का ऐलान किया है। यदि वे सुरक्षा और ऊर्जा के मामलों में ये दोनों समझौते करने में कामयाब रहे, तो वे यह भी पता लगा पाएंगे कि भारत रोजगार की चुनौतियों से कैसे निपट रहा है।

दरअसल, रोजगार के मामले में भारत और फ्रांस की समस्याएं एक समान हैं। दोनों ही देशों में कड़े श्रम कानून हैं, ट्रेड यूनियन काफी ताकतवर हैं, जो उद्योगपतियों को आसानी से आगे नहीं बढ़ने देते हैं। साथ ही, कर्मचारियों में जरूरी हुनर की भी कमी दिखती है। टीमलीज सर्विेसेज, मा फोई रैंडस्टैड और कुछ अन्य भारतीय कंपनियों ने ताकतवर नियामक संस्थाओं और हतोत्साहित करने वाली राजनीतिक-आर्थिक स्थितियों के बीच भी रोजगार के मौके पैदा किए हैं।

इसलिए बेहतर होगा कि ओलांद हुनर के विकास और रोजगार के मौके पैदा करने के काम में लगे भारतीय अफसरों के साथ बैठने के लिए कुछ समय निकालें। ऐसा करने से वे अपने साथ फायदेमंद समझौतों के अलावा कुछ अच्छे आइडियाज भी लेकर फ्रांस लौट सकेंगे।

फ्रांस और भारत की स्थिति लगभग एक सी

भारत और फ्रांस के सामने आंतरिक सुरक्षा की चुनौतियां एक समान हैं। लेकिन दोनों जिस तरह के खतरों का सामना करते हैं, उनके चरित्र में काफी अंतर है। फ्रांस के लिए खतरा उसकी विदेश नीति से अंसतुष्ट उसके अपने नगारिकों का गुस्सा है। भारत के लिए खतरा सीमा पार से आता है। हालांकि पेरिस पर हुए हमले और 26/11 के हमलों के बीच काफी समानता दिखती है, वो हमले किस तरह हुए, इसमें काफी अंतर है।

लिहाजा, भारत और फ्रांस चरमपंथ रोकने के लिए सहयोग के मुद्दे पर बातचीत कर सकते हैं, वे खुफिया जानकारियों की अदला बदली भी कर सकते हैं। इस मुद्दे पर वे बहुत आगे नहीं जा सकते, इसकी एक सीमा है। इसी तरह यूरोजोन संकट से निपटने में भारत फ्रांस की मदद बहुत ज्यादा नहीं कर सकता। बीते कुछ सालों में फ्रांस ने हिंद महासागर इलाके के सुरक्षा मामलों में अपनी भूमिका बढ़ाई है।

ला रीयूनियन और मायोट द्वीपों पर कब्जा होने और दूर दूर तक फैले विशाल एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन की वजह से फ्रांस हिंद महासागर में खुद को एक बड़े खिलाड़ी के रूप में देखता है। जिबूती और अबू धाबी में इसके सैनिक अड्डे भी हैं। वह इनके जरिए अफ्रीका, मध्य पूर्व और अफगानिस्तान में हस्तक्षेप कर सकता है। इसके उलट, मलक्का जलडमरूमध्य के पूरब में फ्रांस की ताकत काफी सीमित है।
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दोनों देश करते हैं साझा सैन्य अभ्यास

पश्चिम हिंद महासागर के इलाके में भारत की अहमियत महत्वपूर्ण है। ला रीयूनियन में तो भारतीय मूल के काफी लोग रहते हैं। इसलिए समुद्र के इस हिस्से पर प्रभाव बढ़ाने को लेकर दोनों देशों के बीच एक तरह की होड़ भी है। दूसरी ओर समुद्री परिवहन में छूट के मुद्दे पर भारत और फ्रांस के बीच पूर्वी हिंद महासागर इलाके में सहयोग बढ़ रहा है।

दोनों देशों के सत्ता प्रतिष्ठान रणनीति और साझा सैन्य अभ्यास के मुद्दे पर पहले से ज्यादा बातचीत करना चाहते हैं। फ्रांस के लिए यह जरूरी है कि 21वीं सदी में अंतरराष्ट्रीय ताकत बन कर उभरने के लिए वह दिल्ली से नजदीकी का रिश्ता रखे। फ्रांस ने दूरदर्शिता दिखाते हुए साल 1998 में ही भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी की पहल की थी।

फ्रांस ने शीतयुद्ध युग से अब तक हमेशा ही पश्चिम के बढ़ते दबाव को कम करने में भारत की मदद की है। उसने सुरक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा, इन सभी मुद्दों पर जरूरत पड़ने पर भारत की बेहिचक सहायता की है। यह जिम्मेदारी मोदी सरकार की है कि वह इस रिश्ते को और मजबूत करे और फ्रांस को बड़ा साझेदार बनाए।
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