बिहार में करारी हार के बहाने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की परेशानी बढ़ाने की पार्टी के बुजुर्ग सेना की कवायद सिर चढ़ती नहीं दिख रही है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांता कुमार और यशवंत सिन्हा की ओर से मोदी-शाह के खिलाफ साझा हमले के बाद इन्हें उन नेताओं का ही सहारा मिल रहा है जो कि इनकी तरह ही पार्टी में हाशिये पर हैं।
साझा हमले के बाद इन नेताओं को भोला सिंह, करिया मुंडा और संघप्रिय गौतम का ही साथ मिला है जो कि पहले से किनारे कर दिए गए हैं। इसके अलावा नेतृत्व पर हमला बोलने वालों में शामिल सांसद शत्रुघ्न सिन्हा और आरके सिंह बुजुर्ग सेना के हमले से पहले ही नेतृत्व के खिलाफ हमलावर हैं। बुजुर्ग सेना के लिए मुश्किल यह है कि इन्हें अब तक पार्टी की दूसरी पंक्ति के नेताओं में से एक का भी साथ नहीं मिला है।
इसके अलावा कई सांसद और नेता नाराज होने के बावजूद सार्वजनिक रूप से अपना मुंह खोलने से बच रहे हैं। जबकि संघ ने फिलहाल इस मामले से खुद को दूर ही रखा है। इस स्थिति से नेतृत्व जहां खुश है, वहीं बुजुर्ग सेना नेतृत्व को घेरने के लिए नई रणनीति पर मंथन में जुटा है। दिवाली की पूर्व संध्या पर भाजपा की बुजुर्ग सेना की ओर से मोदी-शाह की जोड़ी पर हमले से एकबारगी पार्टी में उथलपुथल की स्थिति बनती दिख रही थी। बुजुर्ग सेना को लगा था कि उनकी ओर से मोर्चा खोले जाने के बाद उन्हें पार्टी में एक बड़े वर्ग का आसानी से साथ हासिल हो जाएगा।