प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार से डिजिटल इंडिया सप्ताह की शुरुआत की है, इस दौरान सरकार डिजिटल क्रांति को लेकर अपने इरादे भी जाहिर किए सरकार की मंशा है कि डिजिटल इंडिया के मार्फत लोगों को रोजमर्रा की सहूलियतें दिलाई जाएं।
लेकिन डिजिटल इंडिया प्रोग्राम के अंदर होने वाली चीजें पहले भी हो रही थी, तो फिर नई सरकार के पास नया क्या है? सरकार ने इस अभियान के तहत नौ क्षेत्रों को निर्धारित किया है।
क्या हैं ये नौ लक्ष्य और इन्हें पारा करने में सरकार के सामने क्या चुनौतियां सामने आएंगी? बीबीसी संवाददाता पारुल अग्रवाल ने डिजिटल मामलों के जानकार ओसामा मंजर से बात की।सरकार का पहला लक्ष्य है ब्रॉडबैंड हाइवे।
ये हैं सबसे बड़ी बाधा
इसके तहत देश के आख़िरी घर तक ब्रॉडबैंड के ज़रिए इंटरनेट पहुंचाने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन इसमें सबसे बड़ी बाधा है कि नेशनल ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क का प्रोग्राम, जो तीन-चार साल पीछे चल रहा है।
सरकार को ये समझना होगा कि जब आप गांव-गांव तार बिछाने जाएंगे तो आप उन लोगों को ये काम नहीं सौंप सकते जो पिछले 50 साल से कुछ और बिछा रहे हैं।
आपको वो लोग लगाने होंगे जो ऑप्टिक फ़ाइबर नेटवर्क की तासीर समझते हैं। सरकार का दूसरा लक्ष्य है सबके पास फोन की उपलब्धता, जिसके लिए जरूरी है कि लोगों के पास फोन खरीदने की क्षमता हो।
पंचायत स्तर पर पीएसओ मुश्किल काम
ख्याल अच्छा है लेकिन सरकार को ये सोचना होगा कि क्या सबके पास फोन खरीदने की क्षमता आ गई है, या फिर सरकार अगर ये सोच रही है कि वो खुद सस्ते फोन बनाएगी तो इसके लिए तकनीक और तैयारी कहां है?
तीसरा स्तंभ है पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्रोग्राम, हर किसी के लिए इंटरनेट हो यह अच्छी बात है। इसके लिए पीसीओ के तर्ज पर पब्लिक इंटरनेट एक्सेस प्वाइंट बनाए जा सकते हैं।
ये पीसीओ आसानी से समस्या हल कर सकते हैं, लेकिन हर पंचायत के स्तर पर इसको लगाना और चलाना कोई आसान काम नहीं है. इसी के चलते पिछले कई साल से योजना लंबित है।
धांधली की आशंका!
चौथा है ई-गवर्नेंस, यानी सरकारी दफ्तरों को डिजीटल बनाना और सेवाओं को इंटरनेट से जोड़ने का। इसे लागू करने का पिछला अनुभव बताता है कि दफ्तर डिजीटल होने के बाद भी उनमें काम करने वाले लोग डिजिटल नहीं हो पा रहे हैं।
इसका तोड़ निकालने का कोई नया तरीका ढूंढा है किया सरकार ने? ये ई-गवर्नेंस से जुड़ा मसला है और सरकार की मंशा है कि इंटरनेट के जरिए विकास गांल-गांव तक पहुंचे।
मुझे लगता है इस पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है.ई-क्रांति के लिए हमारा दिमाग, हमारी सोच, हमारा प्रशिक्षण और उपकरण सबकुछ डिजिटल होना ज़रूरी है।
केवल शहरों तक सीमित हैं हम
अगर हमने सरकार के ढांचे को इंटरनेट से नहीं जोड़ा तो फिर इसके तहत डिलीवरी कैसे करेंगे?और अगर कर भी दी, तो सही में इसका फायदा लोगों तक नहीं पहुंचता है, इसमें बड़ी धांधली होती है।
सरकार ने अपने लिए छठा लक्ष्य रखा है इंफ़ोर्मेशन फॉर ऑल यानी सभी को जानकारियाँ मुहैया कराई जाएंगी। लेकिन सवाल उठता है कि एक्सेस टू इंफॉर्मेशन के अभाव में यह कैसे संभव है?
इसके लिए जरूरी है अच्छा एक्सेस इंफ्रास्ट्रक्चर होना ताकि लोग आसानी से जानकारियां पा सकें। साथ ही इसके तहत सिर्फ सूचनाएं पहुंचाना सरकार का लक्ष्य है या ज़मीनी सूचनाएं इक्ठठी करना भी है।
रुरल बीपीओ
अगर सिर्फ पहुंचाना मकसद है तो यह गैर-लोकतांत्रिक है। सातवां लक्ष्य है इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादन का, इसके तहत उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए कल-पुर्जों के आयात को शून्य करना है।
यह कभी भी संभव नहीं है क्योंकि पूरी दुनिया चाहती है व्यापार करना। जहां तक इलेक्ट्रॉनिक्स उत्पादों के उत्पादन का सवाल है तो अभी तक हम इस मामले में शहरों तक ही सीमित हैं और गांवों तक जा ही नहीं रहे हैं।
इसमें नीति और नियमितता की चुनौतियां बहुत ज्यादा है। आठवां है आईटी फॉर जॉब्स सरकार अगर आईटी क्षेत्र के जरिए नौकरियां पैदा करना चाहती हैं तो मेरे ख्याल से हर ब्लॉक स्तर पर हमें रूरल बीपीओ खोल देना चाहिए।
अपनाना होगा नया रवैया
रुरल बीपीओ प्रोग्राम से रोज़गार के अवसर भी बनेंगे, डिजिटाइजेशन और ई-गवर्नेंस भी होगा. ये काम भी पिछले कई साल से लंबित है।
डि़जीटल क्रांति के लिए नौवां स्तंभ है अर्ली हार्वेस्ट प्रोग्राम, इस लक्ष्य को मैं बिलकुल नहीं समझ पाया हूं। मोटे तौर इसका संबंध दफ्तरों और स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थियों और शिक्षकों की हाजिरी से है।
सरकार इसके ज़रिए क्या करना चाहती है ये जनना जरूरी है। लेकिन अहम बात यह है कि क्या हम इन नौ उद्देश्यों को पुराने दिमाग से चला रहे हैं?
लगेंगे दस साल
अगर वही ईंट-पत्थर तोड़ने वाले राज-मिस्त्री जमीनी स्तर पर इसके लिए काम करेंगें तो क्या काम हो पाएगा? और अगर हम इसे नई सोच के तहत करना चाहते हैं तो इसके लिए हमें पूरी तरह से नया रवैया अपनाना पड़ेगा।
गांव में डिजीटल तकनीक को लेकर मैंने जो काम किया है उसके आधार पर कह सकता हूं कि अगर सब-कुछ सटीक उस तरह हो जाए जैसा कागजों पर दिखता है तब भारतीय परिस्थितियों में इन लक्ष्यों को पूरा होने में कम से कम दस साल लगेंगे।