सारदा चिट फंड घोटाला मामले की जांच सीबीआई से कराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ममता बनर्जी को अब तक का सबसे बड़ा सियासी झटका लगा है। इस फैसले का चुनाव पर ही नहीं बल्कि चुनाव के बाद भी दूरगामी असर पड़ना तय माना जा रहा है।
दरअसल यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में आम चुनाव के अंतिम चरण में उन 17 सीटों पर मतदान होना है, जिनमें 14 सीटों पर फिलहाल तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है।
ममता को उठाना पड़ सकता है खामियाजा
जाहिर है कि इस फैसले का खामियाजा ममता को जहां चुनाव में उठाना पड़ सकता है, वहीं चुनाव के बाद उन्हें इस फैसले की कीमत भावी सरकार के हर सही गलत फैसले पर सहमति की मुहर लगाने के रूप में भुगतनी पड़ सकती है।
ठीक उसी तरह जैसे बीती सरकार में सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती को हर बुरे वक्त में यूपीए सरकार का ना चाहते हुए भी साथ देना पड़ा था। इसके अलावा इस मुद्दे को भुनाने के लिए माकपा, कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा भी जमीन आसमान एक कर देगी।
स्थानीय पुलिस से जांच पर अड़ी थीं ममता
चूंकि घोटाले की जांच सीबीआई से कराने का फैसला सुप्रीम कोर्ट का है, इसलिए तृणमूल को अंतिम चरण के चुनाव प्रचार में इस सवाल का जवाब देना बेहद मुश्किल होगा कि आखिर वह इसकी जांच स्थानीय पुलिस से ही कराने पर क्यों अड़ी रही।
आम चुनाव के अंतिम चरण से ठीक पहले आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ममता के सामने एक साथ कई चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हो गई है। अगर किसी तरह उन्होंने इस फैसले का असर चुनाव पर नहीं भी पड़ने दिया तो उनकी भविष्य की राहें आसान नहीं रहने वाली।
सीबीआई कस सकती हैं फंदा
इस फैसले के साथ ही ममता की भी लगाम मुलायम, मायावती, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और वाईएसआर कांग्रेस प्रमुख जगनमोहन रेड्डी की तरह केंद्र की भावी सरकार के हाथों में आ जाएगी।
उल्लेखनीय है कि बीती सरकार के कार्यकाल के दौरान सीबीआई के फंदे की मजबूरी के कारण ही लालू, मुलायम और मायावती को सरकार के हर अलोकप्रिय फैसले का भागीदार बनना पड़ा।
सारदा चिटफंड बना गले की फांस
माना जाता है कि जगन मोहन ने विरोध की कीमत जेल में रह कर गुजारी। अब जबकि सारदा चिट फंड घोटाले की जांच का जिम्मा भी सीबीआई को मिलना तय हो गया है, तब इस स्थिति में ममता के लिए भावी सरकार से टकराना संभव नहीं रह गया है।
वह इसलिए कि इस घोटाले के कई आरोपी सीधे सीधे तृणमूल कांग्रेस से जुड़े हैं।
इसके अलावा ममता के सामने इस फैसले के कारण अंतिम चरण के मतदान में पार्टी की साख बनाए रखने की भी चुनौती है। उल्लेखनीय है कि राज्य की जिन 17 सीटों पर आगामी 12 मई को मतदान होने हैं उन्हें तृणमूल का गढ़ माना जाता है।
आगामी भविष्य को लेकर चिंतित तृणमूल
इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते लोकसभा चुनाव में तृणमूल, कांग्रेस और एसयूसीआई के पास इन 17 सीटों में से 16 तो अकेले तृणमूल 14 सीटें जीती थी। वाम दलों को महज घाटल की एक सीट से ही संतोष करना पड़ा था।
तृणमूल सूत्रों का कहना है कि पार्टी की मुख्य चिंता चुनाव में प्रदर्शन से ज्यादा चुनाव बाद आने वाली परिस्थितियां हैं। पार्टी के नेता इस फैसले से बड़ा सियासी घाटा होने से इंकार तो करते हैं, मगर जांच के कारण भावी सरकार के दबाव में आने की संभावना से इंकार नहीं कर रहे।