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इन लोगों को अब भी है इंसाफ का इंतज़ार

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बसंतोरी, बुकदोबा-हाबी और बोरबोरी के हज़ारों लोग 18 फ़रवरी, 1983 की तारीख़ कभी नहीं भूल सकते हैं। इस दिन इनके अपने मारे गए थे। इसी दिन बसंतोरी गांव के अब्दुल हक़ के परिवार के 12 लोग मारे गए थे, जिनमें उनकी बीवी, बेटे, बेटियां, चचेरे भाई और भतीजी शामिल थे।
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पड़ोस के गांव बुकदोबा-हाबी के मुस्लिमुद्दीन का क़रीब पूरा परिवार- जिसमें बीवी, बेटा और पांच साल की बेटी शामिल थीं, उस सुबह ख़त्म हो गया था। उस दिन बसंतोरी, बुकदोबा-हाबी और आस-पास के गांवों के क़रीब 2,600 लोग 3-4 घंटे के अंदर ही मारे गए थे। कुछ दूरी पर स्थित बोरबोरी गांव में मृतकों की संख्या क़रीब 550 थी।

मृतकों की इतनी बड़ी संख्या की वजह से असम के मोरीगांव क़स्बे का नेली- आज़ादी के बाद भारत में हुए सबसे बड़े नरसंहार का गवाह बना। और यह सब उस वक्त हुआ जब 'असम आंदोलन' अपने चरम पर था।
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आंदोलन का नेतृत्व ऑल इंडिया असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) कर रहा था- जिसके नेताओं ने बाद में राजीव गांधी के साथ हुए समझौते के बाद असम गण परिषद (एजीपी) का गठन किया था। एजीपी ने 1985 में हुए चुनाव में सत्ता भी हासिल की। कुछ साल पहले तक एजीपी एनडीए का घटक दल था।

अब्दुल हक़ बताते हैं, "सुबह क़रीब सात बजे सैकड़ों की संख्या में आदिवासियों और स्थानीय बदमाशों ने घरों में आग लगानी शुरू कर दी। वे पूर्व और पश्चिम दोनों ओर से आ रहे थे। सारे गांववाले मेरे घर के पीछे- धान के खेतों में इकट्ठे हो गए।" हक़ अपने घर के उत्तर में एक पेड़ की ओर इशारा कर रहे थे जो बसंतोरी गांव में हुए नरसंहार का मूक गवाह बना था।

मुंह ढंके लोगों ने गोलीबारी शुरू कर दी

बसंतोरी के अब्दुल सुभान ने कहा, "दूर से हमने देखा कि सैकड़ों लोग ट्रकों से उतरे, तुरंत अपने मुंह ढंके और उसके बाद गोलीबारी शुरू हो गई। आदिवासी धनुष-बाण लिए हुए थे। सबने इधर-उधर भागना शुरू कर दिया। ज़्यादातर लोग उत्तर-पश्चिम में नदी की ओर भाग रहे थे।"

बोरबोरी में हमले का तरीक़ा ठीक वैसा ही था जैसा बसंतोरी और बुकदोबा-हाबी में। बोरबोरी गांव में बचने वाले सबसे बुज़ुर्ग लोगों में से एक मोहम्मद नुरुज्ज़मान भुइयां ने कहा, "हर व्यक्ति भाग रहा था। किसी को गोली लग रही थी तो किसी को तीर। किसी के पास यह देखने का वक़्त नहीं था कि कौन गिरा है।"

भुइयां की बीवी, बेटे, बेटियां और भतीजे उस दिन मारे गए थे। इन गांवों में ऐसा एक भी घर नहीं है जिसके परिवार वाले- मां, बाप, भाई, बहनें- मारे न गए हों। वे लोग ख़ुशक़िस्मत थे जो किसी तरह नदी तक पहुंच गए और उसे पार करके दो-तीन दिन छुपे रहे।

कच्ची सड़क पर चलते हुए अब्दुल हक़ क़रीब 30 साल की एक महिला, ज़ोहरा ख़ातून, के पास रुके और उनसे मेरा परिचय करवाया।

पांच दिन तक जिंदा रही वो बच्‍ची

गांव के बुज़ुर्गों ने बताया था कि नरसंहार के वक़्त ज़ोहरा ख़ातून इतनी छोटी थीं कि भाग ही नहीं सकती थीं। लेकिन किसी चमत्कार से वह पांच दिन तक ज़िंदा रहीं। उन्होंने कहा कि उनके पिता उनके ज़िंदा बचने के बारे में उन्हें बताया था और यह एक चमत्कार की तरह ही लगता है।

ज़ोहरा ख़ातून ने कहा, "मेरे पिता ने बताया कि जब नरसंहार हुआ तब मैं सिर्फ़ छह महीने की थी। जब मेरी मां धान के खेतों की ओर भाग रही थी तो मैं उनकी गोद में थी। वह गिरीं और उनकी मौत हो गई, मेरे पिता को भी मेरे बारे में पता नहीं था। नरसंहार के पांच दिन बाद मैं एक पुलिसकर्मी को मिली। मैं अपनी मां के मृत शरीर से चिपकी हुई थी। फिर मुझे मेरे पिता को सौंप दिया गया- जो एक राहत शिविर में रह रहे थे।"

बसंतोरी के अब्दुल सुभान कहते हैं, "कुछ किलोमीटर दूर मुख्य राजमार्ग पर अर्ध सैनिक बल गश्त लगा रहे थे। संभवतः उन्होंने लगातार जारी गोलियों की आवाज़ें सुनी और कुछ धुआं उठता देखा। लेकिन स्थानीय पुलिसकर्मियों ने उन्हें कहीं और भेज दिया। बाद में कुछ महिलाओं ने हिम्मत दिखाई और गश्त लगा रहे वाहनों को रोककर अर्ध सैनिक बलों को यहां के बारे में बताया। क़रीब 11 बजे अर्ध सैनिक बल पहुंचे और बदमाशों पर गोलियां चलानी शुरू कीं, लेकिन तब तक वे भागना शुरू कर चुके थे।"

उस वक्त चुनाव के लिए कुछ ही वक्त बचा था और चुनाव बहिष्कार का आह्वान किया जा रहा था। लेकिन इन गांवों के बंगाली भाषी मुसलमानों ने वोट देने का फ़ैसला किया था। नरसंहार से दो दिन पहले पुलिस ने गांव के बुज़ुर्गों को बुलाया था और एक शांति समिति बनाई गई थी। पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए गश्त लगानी शुरू कर दी थीं।
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घर ढहाए जा चुके थे

नरसंहार में बचने वाले एक व्यक्ति के अनुसार, "लेकिन उस दिन पुलिसबल कुछ घंटे के लिए ग़ायब हो गया था।" बसंतोरी के अब्दुल सुभान और बोरबोरी के ज़ाहिदुर रहमान जब तक हिम्मत जुटा कर वापस लौटे तब तक सब कुछ लुट चुका था। उनके घर ढहाए जा चुके थे और सुरक्षा बलों ने जल्दबाज़ी में सैकड़ों लाशों को दफ़ना दिया था। नुरुल अमीन मुझे बसंतोरी के बाहर एक खेत तक ले गए और कहा, "वहां सभी 2,600 लाशें पड़ी थीं।"

सुभान ने कहा, "सामूहिक क़ब्र से हाथ और पैर बाहर निकलते हुए दिख रहे थे। बाद में हमने सामूहिक क़ब्र में पूरे सलीक़े से दफ़न करने का इंतज़ाम किया।" नरसंहार के 31 साल बाद भी किसी भी गांव में मारे गए लोगों की याद में स्मारक नहीं बनाया जा सका है।

हालांकि उसके बाद से नेली, हर चुनाव में मतदान करता रहा है। बोरबोरी के मोहम्मद शफ़ीक़-उल्लाह अफ़सोस जताते हुए कहते हैं, "उस जीर्ण-शीर्ण भवन को देखो- कभी वहां स्वास्थ्य केंद्र हुआ करता था। लेकिन पिछले साल से वहां एक भी डॉक्टर नहीं है। हमें मरीज़ों को 8 से 10 किलोमीटर तक लेकर जाना पड़ता है। गांव के 1800 लोगों के लिए सिर्फ़ एक ट्यूबवेल है। सड़कें कच्ची हैं।"

उन्होंने कहा, "नरसंहार के कुछ दिन बाद हेलिकॉप्टर से आईं प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राष्ट्रपति ज्ञानी ज़ैल सिंह ने हर तरह की मदद का वायदा किया था। फिर भी तीन दशक में कुछ नहीं हुआ।" बसंतोरी के मुस्लिमुद्दीन कहते हैं, "हम लोगों को हर लाश के लिए 5,000 रुपए और टीन की नालीदार चादरें मिलीं। बस।"

शफ़ीक़-उल्लाह बताते हैं, "और युवाओं को- हर परिवार में से कम से कम एक- को नौकरी की तलाश में केरल जाना पड़ा। क्योंकि वे लोग बाहर चले गए हैं सिर्फ़ इसी वजह से हम अपने परिवार पाल पा रहे हैं।" और वे सभी युवा केरल से असम वापस आए हैं- सिर्फ़ इस चुनाव में वोट देने के लिए। अब्दुल सुभान कहते हैं, "हमें अभी तक इंसाफ़ नहीं मिला है।"
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