आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के बाद भाजपा नेताओं ने नरेंद्र मोदी को फूलों की मालाओं से लाद दिया, लेकिन इन मालाओं के साथ उनके सिर पर एक ऐसा ताज भी पहनाया गया जिसे किसी ने देखा तो नहीं, लेकिन महसूस सभी ने किया। वह ताज कांटों भरा है।
इस कांटों भरे ताज में मोदी के सामने अब ढेरों चुनौतियां छिपी हैं। सबसे बड़ी चुनौती एक दशक से केंद्र की सत्ता से बाहर भाजपा को दिल्ली का तख्त दिलाने की है। इसके लिए भाजपा को लोकसभा चुनाव में 272 का आंकड़ा पार करना है।
इस जादुई आंकड़े को पाने के लिए उन्हें लोकसभा में भाजपा की झोली में कम से कम 200 सीटें दिलानी होंगी व एनडीए का विस्तार भी कर नए साथी तलाशने होंगे। जबकि गुजरात के दंगों के कारण मोदी के नाम पर भाजपा के लिए अब नये साथी जुटाना भी आसान कार्य नहीं है।
मोदी के नाम पर बिहार में भाजपा का सबसे विश्वसनीय साथी जदयू पहले ही अलग राह चल पड़ा है। हालांकि भाजपा का दावा है कि मोदी के नाम पर देशभर में भारी लहर है और पार्टी लोकसभा चुनाव में 200 का आंकड़ा पार कर लेगी।
मोदी तो अब तक गुजरात की सीमा के भीतर ही सियासी पारी खेलते रहे हैं, लेकिन अब वे उन्हें पूरे देश में अपनी काबिलियत साबित करनी होगी।
लोकसभा चुनाव से पहले मोदी के सामने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हैं। मिजोरम में तो भाजपा पहले से कमजोर है, लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में सत्ता में लौटने तथा राजस्थान व दिल्ली को कांग्रेस से छीनने का प्रयास में है। इन राज्यों के चुनाव नतीजे भी मोदी के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं होंगे।
यदि ये चुनाव नतीजे भाजपा के अनुकूल नहीं आए तो आडवाणी खेमा उनकी लोकप्रियता का गुब्बारे की हवा भी निकालने में पीछे नहीं रहेगा। मोदी के सामने आंतरिक कलह से जूझ रही पार्टी को लोकसभा चुनाव के लिए तैयार करना भी बड़ी चुनौती है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के खुले तौर पर मोदी के विरोध में आ जाने से माना जा रहा है कि यह खेमा आगे भी उनकी राह में कांटे बिछाता रहेगा।