साहित्यकार अपनी रचनाओं के जरिये अपने अनुभवों को शक्ल देता है। प्रेमचंद ने ज़िंदगी की दुश्वारियों को बड़े करीब से देखा और महसूस किया था निज़ी ज़िंदग़ी के उनके अनुभव उनकी कलम में बख़ूबी ज़ाहिर होते हैं।
गोदान का किरदार होरी याद है न आपको। जमींदार के यहां से लौटने पर बेटा तंज करता है तो होरी ज़वाब देता है, ‘हमारे पांव में भी शनीचर नहीं है और न ही सलामी करने का कोई बड़ा सुख मिलता है।
लेकिन हमारी गर्दन दूसरों के पैरों के नीचे दबी है इसलिए अकड़ नहीं सकते।’ इस प्रसंग में होरी का यह जवाब बेबसी के साथ उसकी आहत खुद्दारी को भी बयां करता है।
आज मुंशी प्रेमचंद का जन्मदिवस है। मुंशी जी का जीवन संघर्षों भरा रहा, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में अपनी हाज़िरी दर्ज कराने के लिए उन्होंने गाहे-बगाहे अख़बारनवीसी भी जारी रखी।
उस दौर की पत्रकारिता के हालात का जिक्र मुंशी जी ने 24 अप्रैल 1919 को ज़माना अख़बार के संपादक दयानरायन निगम को लिखे एक पत्र में किया है, ‘आपने मेरे लिए कोई ऐसी तज़वीज़ नहीं निकाली जिसमें फ़िक़्रे मुआश से आज़ाद होकर मै ज़िंदगी काटता।
मैं अर्ज़ कर चुका हूं कि इससे ज्यादा नफ़्सकुशी मेरे इमकान से बाहर है। अख़बारी ज़िंदगी में किस क़दर तो फ़िक्र और झंझट, उस पर 50-60 रुपये से ज़्यादा कोई देनेवाला नहीं।
अभी हमारे यहां वह ज़माना नहीं आया कि जर्नलिज्म में कॅरियर बनाया जा सके। आप ‘लीडर’ की तरह कोई कम्पनी क़ायम करें। वह माहवार रिसाला, रोज़ाना अख़बार निकाले, कारकुनों को माकूल तनख्वाह दे तब देखिये मैं कितनी खुशी से दौड़ता हूं।
मगर यहां तो यह हाल है कि ‘अवध अख़बार’ भी ग्रेजुएट मुतरज्जिम तलाश करता है तो उसकी तनख्वाह सौ रुपया बतलाता है’। इसी ख़त में उनकी प्रगतिशील विचारधारा भी सामने आती है वह लिखते हैं ‘अगर आप इससे बेहतर कोई सूरत निकाल सकते हैं तो मैं हाज़िर हूं। वर्ना मुझे अपने ढर्रे पर चलने दीजिये। ‘शाकिर’ और ‘साबिर’ बनना मेरे लिए मुमकिन नहीं’।
मुंशी जी और श्री निगम की 31 साल की दोस्ती की अनूठी कहानी है। 1918 में गोरखपुर से उन्होंने श्री निगम को लिखा ‘आप क्या कहते हैं, जिंदगी की उम्मीद यहां भी कम है।
मगर यह चाहता हूं कि या तो साथ चलें या खफ़ीफ़-सी तकदीम-ओ-ताखीर हो। मै आपका पेशरौ बनना चाहता हूं।’ इत्तेफ़ाक ने आख़िरकार मुंशी जी को श्री निगम का पेशरौ बना ही दिया। 1936 में मुंशी जी गए और 1943 के आरंभ में दयाराम निगम।