राजस्थान की रहने वाली आशा जाट समाज के लिए एक मिसाल हैं। एचआईवी पॉजिटिव होने के चलते समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया था लेकिन आशा ने हार नहीं मानी और दूसरी महिलाओं को इस दर्द से मुक्ति देने की ठान ली।
27 साल की आशा जाट को जब एचआईवी पॉजिटिव होने का पता चला तो उनके ससुराल से उन्हें निकाल दिया गया था। उसके बाद वह एक परियोजना से जुड़कर एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं की मदद करने लगीं।
आशा इस घटना के चार साल बाद एक ऐसी स्वास्थ्य परियोजना से जुड़ीं जो एचआईवी पॉजिटिव मांओं और उनके बच्चों को चिकित्सा सहायता दिलाने में मदद करती है।
अब आशा राजस्थान के अजमेर में चल रही इस परियोजना के 25 वॉलेंटियर्स में से एक हैं और पिछले चार सालों में उनकी मदद से 102 एचआईवी पॉजिटिव मांएं स्वस्थ बच्चे को जन्म दे चुकी हैं।
अक्सर एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं का समाज से बहिष्कार कर दिया जाता है और वह सरकारी सुविधाओं का लाभ भी नहीं उठा पातीं। यह प्रोजेक्ट एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं की मदद करता है।
तीन राज्यों में चल रहा प्रोजेक्ट
यह अभियान एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं को सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं(पीपीटीसीटी) तक पहुंच बनाने में मदद करता है। यह प्रोजेक्ट साल 2009 से कर्नाटक, तमिलनाडु और राजस्थान में चलाया जा रहा है।
आशा कहती हैं कि इस परियोजना ने मुझे अपने हक के लिए बोलना सिखाया है।
एचआईवी पॉजिटिव बच्चों की संख्या में आई कमी
यूरोपियन यूनियन और क्रिश्चियन ऐड की मदद से चल रहे इस प्रोजक्ट का उद्देश्य भारत में एचआईवी की रोकथाम करना बढ़ने से रोकना है।
आशा के अनुसार पीपीटीसीटी प्रोजेक्ट के शुरू होने के बाद न केवल महिलाएं सुविधाओं तक पहुंच पा रही हैं बल्कि एचआईवी पॉजिटिव नवजात बच्चों की संख्या में भी कमी आई है।
जिला सरकारी अस्पताल के डॉक्टर पीपीटीसीटी कार्यकर्ताओं को एचआईवी पॉजिटिव लोगों की सूची दे देते हैं। तब वे लोग जरूरतमंद महिलाओं की मदद करते हैं।
लिंग और विकास के मुद्दों पर काम करने वाली एक संस्था के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर अखिल शिवदास बताते हैं कि यह प्रोजेक्ट एचआईवी पॉजिटिव महिलाओं और मांओं को यह कहने की हिम्मत देता है कि मैं एचआईवी पॉजिटिव हूं, मेरा बच्चा नेगेटिव है और मुझे चिकित्सकीय सहायता चाहिए।