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वो औरत, जिसे मोहम्मद अली जिन्ना प्यार करते थे

Sat, 21 Feb 2015 03:33 PM IST
रेहान फजल/बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
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वर्ष 1916 की गर्मियों में जिन्ना के मुवक्किल और दोस्त सर दिनशॉ पेतित ने मुंबई की गर्मी से बचने के लिए उन्हें दार्जिलिंग आने की दावत दी। वहीं जिन्ना की मुलाकात सर दिनशॉ की 16 साल की बेटी रती से हुई, जिनका शुमार अपने जमाने की बंबई की सबसे हसीन लड़कियों में हुआ करता था।
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तीक्ष्ण बुद्धि वाली रती की जितनी दिलचस्पी रोमानी कविताओं में थी, उतनी ही राजनीति में भी। जिन्ना भारतीय राजनीति के शिखर को छूने के बिल्कुल करीब थे।

हालांकि उस समय उनकी उम्र 40 की थी, लेकिन दार्जिलिंग की बर्फ से ढकी खामोश चोटियों और रती के बला के हुस्न ने ऐसा समा बांधा कि रती और जिना एक दूसरे के प्रेम पाश में गिरफ़्तार हो गए।

दार्जिलिंग में ही एक बार रात के खाने के बाद जिन्ना ने सर दिनशॉ से सवाल किया कि दो धर्मों के बीच शादी के बारे में आप की क्या राय है ?

रती के पिता ने छूटते ही जवाब दिया कि इससे राष्ट्रीय एकता कायम करने में मदद मिलेगी। अपने सवाल का इससे अच्छा जवाब तो खुद जिन्ना भी नहीं दे सकते थे।

उन्होंने एक लफ्ज भी जाया न करते हुए अपने पारसी दोस्त दिनशॉ से कहा कि वो उनकी बेटी से शादी करना चाहते हैं।

दो साल तक इंतजार

मोहम्मद अली जिन्‍ना पर किताब लिख रहीं शीला रेड्डी कहती हैं कि जिन्‍ना की इस पेशकश से दिनशॉ गुस्से से पागल हो गए। उन्होंने जिन्‍ना से उसी वक्त अपना घर छोड़ देने के लिए कहा। जिना ने इस मुद्दे पर पूरी शिद्दत से पैरवी की, लेकिन वो दिनशॉ को मना नहीं सके।

दो धर्मों के बीच दोस्ती का उनका फॉर्मूला पहले ही परीक्षण में नाकामयाब हो गया। इसके बाद दिनशॉ ने उनसे कभी बात नहीं की और रती पर भी पाबंदी लगा दी कि जब तक वो उनके घर में रह रही हैं, वो जिना से कभी नहीं मिलेंगी।

और तो और उन्होंने अदालत से भी आदेश ले लिया कि जब तक रती वयस्क नहीं हो जातीं, जिना उनसे नहीं मिल सकेंगे।

सर दिनशॉ का वास्ता एक ऐसे बैरिस्टर से था जो शायद ही कोई मुकदमा हारता था। दिनशॉ जितने ज‌िद्दी थे, लंबे अर्से से इश्क की जुदाई झेल रहा ये जोड़ा उनसे ज्यादा ज‌िद्दी साबित हुआ। दोनों ने धीरज, ख़ामोशी और शिद्दत से रती के 18 साल के होने का इंतजार किया।

जिना के एक और जीवनीकार प्रोफेसर शरीफ अल मुजाहिद कहते हैं कि 20 फरवरी, 1918 तो जब रती 18 साल की हुईं तो उन्होंने एक छाते और एक जोड़ी कपड़े के साथ अपने पिता का घर छोड़ दिया।

जिन्‍ना किया रती से निकाह

जिन्‍ना रती को जामिया मस्जिद ले गए जहां उन्होंने इस्लाम कबूल किया और 19 अप्रैल, 1918 को जिना और रती का निकाह हो गया।

रती जिन्‍ना पर किताब लिखने वाले ख्वाजा रजी हैदर कहते हैं कि जिना इंपीरियल लेजेस्लेटिव काउंसिल में मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। अगर वो सिविल मैरेज एक्ट के तहत शादी करते तो उन्हें संभवत: अपनी सीट से इस्तीफा देना पड़ता।

इसलिए उन्होंने इस्लामी तरीके से शादी करने का फैसला किया और रती इसके लिए तैयार भी हो गईं। निकाहनामे में 1001 रुपए का महर तय हुआ, लेकिन जिना ने उपहार के तौर पर रती को एक लाख पच्चीस हजार रुपए दिए जो 1918 में बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी।

जिना की अपने से 24 साल छोटी लड़की से शादी उस जमाने के दकियानूसी भारतीय समाज के लिए बहुत बड़ा झटका थी।

जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा द स्कोप ऑफ हैपीनेस में लिखा है, "श्री जिन्‍ना की अमीर पारसी सर दिनशॉ की बेटी से शादी से पूरे भारत में एक तरह का आंदोलन खड़ा हो गया। मैं और रती करीब-करीब एक ही उम्र की थीं, लेकिन हम दोनों की परवरिश अलग-अलग ढ़ंग से हुई थी। जिना उन दिनों भारत के नामी वकील और उभरते हुए नेता थे। ये चीजें रती को अच्छी लगती थीं। इसलिए उन्होंने पारसी समुदाय और अपने पिता के विरोध के बावजूद जिन्‍ना से शादी की।"

सरोजिनी नायडू भी मुरीद

भारत कोकिला के नाम से मशहूर सरोजिनी नायडू ने भी डॉक्टर सैयद महमूद को लिखे पत्र में जिन्‍ना की शादी का ज‌िक्र करते हुए लिखा, "आख‌िरकार जिन्‍ना ने अपनी इच्छा के नीले गुलाब को तोड़ ही लिया। मैं समझती हूं कि लड़की ने जितनी बड़ी कुर्बानी दी है उसका उसे अंदाज़ा ही नहीं है, लेकिन जिन्‍ना इसके हकदार हैं। वो रती को प्यार करते हैं। उनके आत्मकेंद्रित और अंतर्मुखी व्यक्तित्व का यही एक मानवीय पहलू है।"

ख़्वाजा रजी हैदर लिखते हैं कि सरोजिनी नायडू भी जिन्‍ना के प्रशंसकों में से एक थीं और 1916 के कांग्रेस अधिवेशन के दौरान उन्होंने जिन्‍ना पर एक कविता भी लिखी थी।

जिन्‍ना के जीवनीकार हेक्टर बोलिथो ने अपनी किताब में एक बूढ़ी पारसी महिला का ज‌िक्र किया है जिसका मानना था कि सरोजिनी को भी जिन्‍ना से इश्क था, लेकिन जिना ने उनकी भावनाओं का जवाब नहीं दिया। वो ठंडे और अलग-थलग बने रहे।

हालांकि सरोजिनी बंबई की नाइटिंगेल के रूप में जानी जाती थीं लेकिन जिना पर उनके सुरीले गायन का कोई असर नहीं हुआ।

जिन्‍ना के एक और बॉयोग्राफर अजीज बेग ने रती और सरोजिनी नायडू के जिना के प्रती प्रेम का ज‌िक्र अपनी किताब में एक अलग शीर्षक के तहत किया है और उसका नाम उन्होंने दिया है, ’टू विनसम विमेन।

गजब की खूबसूरत

अजीज बेग लिखते हैं कि एक फ़्रेंच कहावत है कि मर्दों की वजह से औरतें एक दूसरे को नापसंद करने लगती हैं। लेकिन सरोजिनी में रती के प्रति जलन का भाव कतई नहीं था। वास्तव में उन्होंने जिन्‍ना को रती से शादी करने में मदद की।

वर्ष 1918 के उस वसंत में जिन्‍ना और रती के दमकते और खुशी से भरे चेहरों को देख कर लगता था कि वो एक दूसरे के लिए ही बने हैं।

रती के हसीन लचकते हुए बदन पर सुर्ख और सुनहरे, हल्के नीले या गुलाबी रंग की पारदर्शी पोशाकें होतीं। वो चांदी और संगमरमर के लंबे सिगरेट होल्डरों में दबी अंग्रेज़ी सिगरेटों का धुंआँ उड़ातीं, जिससे उनकी शख्सियत में चार चांद लग जाते।

वैसे भी उनकी हर अदा और उनकी खनकती हुई बेसाख्ता हंसी उनकी मौजूदगी को और खुशनुमा बना देती थी।

ख़्वाजा रज़ी हैदर लिखते हैं कि महमूदाबाद के राजा अमीर अहमद खाँ की उम्र साढ़े चार साल की रही होगी जब जिना और रती अपने हनीमून के दौरान उनके पिता की लखनऊ की कोठी में ठहरे थे।

रती सफेद रंग की सुनहरे और काले बॉर्डर की साड़ी पहने हुए थीं और वो उन्हें एक परी की तरह लग रहीं थीं। राजा अमीर खां उनसे दोबारा 1923 में मिले थे जब जिन्‍ना और रती दिल्ली के मेंडेस होटल में ठहरे हुए थे। उस समय उन्होंने उन्हें खिलौने खरीदने के लिए पांच सौ रुपए दिए थे।

रती और जिन्‍ना के दोस्त कांजी द्वारका दास ने भी अपनी किताब में लिखा है, "मैं उनसे अपनी आंख नहीं हटा पाता था और तब तक उनकी बग्घी को निहारा करता था जब तक वो मेरी निगाहों से ओझल नहीं हो जाती थी।"

रती की पोशाक पर तकरार

प्रोफेसर शरीफ अल मुजाहिद रती जिन्‍ना के बारे में एक दिलचस्प किस्सा सुनाते हैं। एक बार बंबई के गवर्नर विलिंगटन ने जिन्‍ना दंपति को खाने पर बुलाया।

रती भोज में एक लो कट पोशाक पहन कर गईं। जब वो खाने की मेज पर बैठीं तो लेडी विलिंगटन ने अपने एडीसी से कहा कि वो रती जिन्‍ना के लिए एक शॉल ले आएं। कहीं उन्हें ठंड न लग रही हो।

ये सुनते ही जिन्‍ना तुरंत उठ खड़े हुए और बोले, "अगर श्रीमती जिना को ठंड लगेगी तो वो शॉल मांग लेंगी।" वो विरोध स्वरूप अपनी पत्नी को डायनिंग हॉल से बाहर ले गए और विलिंगटन के रहते उन्होंने गवर्नमेंट हाउज का कभी रुख नहीं किया।

रती मुंहफट भी थीं। 1918 में जब लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने उन दोनों को शिमला के वायसराय लॉज में भोज पर बुलाया तो उन्होंने हाथ जोड़ कर भारतीय तरीके से वायसराय का अभिवादन किया।

भोज के बाद चेम्सफोर्ड ने उन्हें सलाह दी कि अगर वो अपने पति के राजनीतिक करियर को फलते-फूलते देखना चाहती हैं जो उन्हें वही करना चाहिए जैसे रोम में रहने वाले रोम में करते हैं।

रती ने छूटते ही जवाब दिया, "एक्सलेंसी मैंने वैसा ही किया जैसा कि आप कह रहे हैं। भारत में मैंने भारतीय तरीके से आपका अभिवादन किया!" ख़्वाजा रजी हैदर बताते हैं कि एक और मौके पर रती एक भोज में वायसराय लॉर्ड रेडिंग की बगल में बैठी हुई थी।

जर्मनी की बात चल निकली तो लॉर्ड रेडिंग ने कहा कि मैं जर्मनी जाना चाहता हूं, लेकिन युद्ध के बाद जर्मन हम ब्रिटेनवासियों को अब पसंद नहीं करते... इसलिए मैं वहां नहीं जा सकता। रती ने फ़ौरन कहा, "तब आप भारत में क्या करने आए हैं ( भारत के लोग भी तो आपको पसंद नहीं करते?)"

जिन्‍ना और रती के बीच बढ़ती दूरी

धीरे-धीरे जिना की व्यस्तता और दोनों के बीच उम्र का फर्क जिन्‍ना और रती के बीच दूरी ले आया। उनके पास अपनी जवान बीवी और दुधमुंही बेटी के नखरों के लिए कोई वक्त नहीं था।

जिन्‍ना के सचिव एमसी चागला लिखते हैं कि जब मैं और जिन्‍ना किसी कानूनी मसले पर बात कर रहे होते तो रती कुछ ज़्यादा ही बन-ठन कर आतीं और जिना की मेज पर बैठ कर अपने पैर हिलाने लगतीं कि जिना कब बातचीत खत्म करें और वो उनके साथ बाहर निकलें।

छागला अपनी आत्मकथा 'रोजेज इन दिसंबर' में एक और दिलचस्प किस्सा बताते है, "एक बार रती बंबई के टाउन हॉल में जिना की शानदार लिमोजीन में आई। टिफन ले कर बाहर निकलीं और सीढ़ियां चढ़ने लगीं।

उन्होंने कहा, जे( वो जिना को इसी नाम से पुकारती थीं) सोचो मैं तुम्हारे लिए लंच में क्या लाई हूं। जिना का जवाब था मुझे क्या पता तुम क्या लाई हो। इस पर वो बोलीं मैं तुम्हारे पसंदीदा हैम सैंडविच लाई हूं। इस पर जिना बोले माई गॉड ये तुमने क्या किया? क्या तुम मुझे चुनाव में हरवाना चाहती हो? क्या तुम्हें नहीं पता कि मैं पृथक मुसलमानों वाली सीट से चुनाव लड़ रहा हूं? अगर मेरे वोटरों को पता चल गया कि मैं लंच में हैम सैंडविच खा रहा हूं तो मेरे जीतने की क्या उम्मीद रह जाएगी? ये सुनकर रती का मुंह लटक गया। उन्होंने फौरन टिफ‌िन उठाया और खटाखट सीढ़ियां उतरते हुए वापस चली गईं।"

रज़ी हैदर का आकलन है कि दोनों के बीच अलगाव के राजनीतिक कारण भी थे। 1926 आते आते जिना का भारतीय राजनीति में वो स्थान नहीं रहा था जो 1916 में हुआ करता था। फिर रती बीमार भी रहने लगी थीं।

फ़्रांस में बीमारी के बाद भारत लौटते हुए रती ने पानी के जहाज़ एसएस राजपूताना से जिन्‍ना को पत्र लिखा था, "प्रिय मेरे लिए जितना भी तुमने किया, उसके लिए धन्यवाद। मैंने तुमको जितना चाहा है, उतना किसी पुरुष को नहीं चाहा गया होगा। तुम मुझे उस फूल की तरह याद करना जिसे तुमने तोड़ा था न कि उस फूल की तरह जिसे तुमने कुचल दिया था।"
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29 साल की उम्र में मौत

20 फरवरी, 1929 को मात्र 29 साल की उम्र में रती जिन्‍ना का निधन हो गया।

जिन्‍ना के सचिव रहे और बाद में भारत के विदेश मंत्री बने मोहम्मद करीम चागला अपनी आत्मकथा 'रोजेज इन दिसंबर' में लिखते हैं, "जब रती के पार्थिव शरीर को कब्र में दफ़न करने के बाद जिन्‍ना से कहा गया कि सबसे नज़दीकी रिश्तेदार होने के नाते वो कब्र पर मिट्टी फेंके तो जिना सुबक-सुबक कर रो पड़े थे। ये पहली और आख‌िरी बार था जब किसी ने जिन्‍ना को सार्वजनिक रूप से अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए देखा था।"

बहुत कम लोगों को पता है कि लंदन में अपनी पढ़ाई के दौरान जिन्‍ना शेक्सपियर के किरदार रोमियो की भूमिका निभाने के लिए तरसा करते थे। ये भाग्य की विडंबना ही थी कि जिस प्रेम कथा की शुरुआत एक परी कथा की तरह हुई थी, उसका अंत जिन्‍ना के हीरो शेक्सपियर के मशहूर नाटकों के दुखांत की तरह हुआ।
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