सियासी दबाव के बाद मजबूर हुई मोदी सरकार ने भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में सामाजिक प्रभाव और सहमति के प्रावधान को छोड़कर अहम बदलाव किए हैं। हालांकि सरकार के तेवर में सहमति और सामाजिक प्रभाव के आंकलन पर कोई बदलाव नहीं आया है। नए प्रावधान के जरिये उसने निर्णय की गेंद राज्यों के पाले में डाल दी है। सोमवार को लोकसभा में पेश होने वाले भूमि अधिग्रहण अध्यादेश में इन दो मुद्दों को छोड़ सरकार ने व्यापक बदलाव किए हैं।
सूत्रों के अनुसार, नए प्रावधान में सरकार ने सहमति की गेंद प्रदेश सरकारों के पाले में यह कहते हुए डाली है कि स्थानीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार अपने स्तर पर नियम बना सकती हैं। अध्यादेश में सिंचित भूमि के अधिग्रहण से बचने के लिए सरकार ने प्रावधान में लिखा है कि सरकारी परियोजनाओं के लिए वह महज उसर और बंजर भूमि ही अधिग्रहीत करेगी। सिंचाई वाले भूमि का अधिग्रहण महज विषम परिस्थितियों में ही होगा।
निजी क्षेत्र के लिए जमीन अधिग्रहण से बचते हुए सरकार ने तय किया है निजी उद्देश्य होटल और कारखानों के लिए भूमि अधिग्रहीत करने में सरकार हस्तक्षेप नहीं करेगी। इन उद्देश्यों के लिए किसान मुंह मांगे दामों पर अपनी भूमि बेच सकते हैं। वहीं शहरी क्षेत्र में भूमि अधिग्रहण करने के मामले में भूस्वामी को अधिग्रहीत भूमि में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी देने का प्रावधान किया गया है। भूस्वामी को यह भी मौका दिया जाएगा कि वह अधिग्रहीत भूमि के मूल्य की अन्य भूमि भी सरकार से ले सकता है।