संसद में आर्थिक सुधारों की गाड़ी रोकने की कोशिश हुई तो मोदी सरकार इसे अमली जामा पहनाने के लिए संसद का संयुक्त सत्र बुलाने से नहीं हिचकेगी। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में प्रचंड बहुमत के बावजूद देश और दुनिया के अर्थ जगत में अपनी सरकार के खिलाफ नकारात्मक संदेश जाने का जोखिम नहीं उठाना चाहते। यही कारण है कि प्रधानमंत्री ने अपने आर्थिक एजेंडे से जुड़े महत्वपूर्ण बिलों मसलन बीमा, कोयला और कंपनी बिल को कानूनी जामा पहनाने के लिए किसी भी सीमा तक जाने का मन बना लिया है। विपक्ष खासतौर से कांग्रेस के बदले रुख के बाद सरकार संयुक्त सत्र बुलाने के मामले में बीते सप्ताह से ही लगातार मंथन कर रही है।
कांग्रेस जिस प्रकार संसद और खासतौर से राज्यसभा में विभिन्न विवादों पर अचानक बनी विपक्षी एकता के प्रति खास दिलचस्पी दिखा रही है, उससे सरकार बेहद सतर्क है। वैसे भी सरकार को अपने मेक इन इंडिया अभियान की चिंता है तो दूसरी ओर अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा अगले महीने के अंत में भारत आ रहे हैं। सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री के मुताबिक आर्थिक एजेंडे पर किसी भी कीमत पर पीछे न हटने और जरूरत पड़ने पर संयुक्त सत्र बुलाने की पहल करने का फैसला खुद पीएम का है। विपक्ष के तेवरों के बारे में पीएम ने वरिष्ठ मंत्रियों से चर्चा की है।
उनका साफ कहना है कि बहुमत वाली सरकार होने के कारण अर्थ जगत में आर्थिक सुधार पर नई सरकार के कदम पीछे खींचने जैसे नकारात्मक संदेश नहीं जाने चाहिए। इसके बाद से ही सरकार अंदर खाने संयुक्त सत्र के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रही है। उक्त मंत्री के मुताबिक बहरहाल सब कुछ राज्यसभा में कांग्रेस के रुख पर निर्भर करेगा। विपक्ष ने राज्यसभा में आर्थिक बिलों की राह रोकी तो भाजपा यह प्रचार करेगी कि कांग्रेस और विपक्षी दल राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत न होने का बेजा लाभ उठा रही है। पार्टी का मानना है कि उद्योग जगत भी तब कांग्रेस को सवालों के कठघरे में खड़ा करेगा।
मोदी सरकार के एजेंडे को रोकेगी कांग्रेस
आर्थिक सुधारों की वकालत करने वाली कांग्रेस राजनीतिक नफे नुकसान की चाहत में पुराने सिद्धांतों को छोड़ सकती है। पार्टी मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों के एजेंडे को रोकने पर गंभीरता से विचार कर रही है। कांग्रेस पर बीमा, कोयला आवंटन और कंपनी विधेयक रोकने का भारी दबाव है। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस मुद्दे पर अंतिम फैसले के लिए मंगलवार को संसद भवन के पार्टी कार्यालय में प्रमुख नेताओं की बैठक बुलाई है। उधर, मंगलवार को ही सरकार राज्यसभा में बीमा संशोधन विधेयक पेश करेगी।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोनिया को बीमा विधेयक पर सरकार का समर्थन करने की सलाह दी है। मगर पार्टी के अंदर एक बड़ा वर्ग हाईकमान पर सरकार के आर्थिक सुधार के एजेंडे को रोकने के लिए दबाव बना रहा है। राज्यसभा में सोमवार को कांग्रेस, माकपा, तृणमूल कांग्रेस समेत समूचे विपक्ष ने सरकार को देश में सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने समेत तमाम मुद्दों पर घेरने की कोशिश की। बीमा बिल को हंगामे के जरिए रोकने की रणनीति है, जबकि कोयला आवंटन संबंधित विधेयक को राज्यसभा की सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग कांग्रेस कर सकती है।
कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि आर्थिक सुधारों से संबंधित बिलों को रोकने के चलते ही इन मुद्दों को जोर-शोर से उठाया जा रहा है। पार्टी के एक नेता ने कहा कि कांग्रेस बीमा विधेयक का खुलकर विरोध करना नहीं चाहती। क्योंकि यह उसकी ओर से ही बनाया गया विधेयक था। इसलिए बिल पर गठित राज्यसभा की सेलेक्ट कमेटी में कांग्रेस सदस्यों ने इसका औपचारिक तौर पर समर्थन किया। मगर बदली परिस्थितियों में कांग्रेस पर्दे के पीछे से इसे रोकने की कोशिश कर सकती है।
कोयला खान विशेष अध्यादेश बिल को राज्यसभा में रोकेगी कांग्रेस
कोल ब्लॉक के आवंटन के रद्द होने से ठप कोयला और बिजली सुधारों को आगे बढ़ाने के मोदी सरकार की कोशिशों में कांग्रेस ने रोड़ा अटकाने का फैसला किया है। कांग्रेस लोकसभा में पिछले हफ्ते पारित हो चुके कोयला खान विशेष उपबंध विधेयक को राज्यसभा में पास होने से रोकेगी। कोयला अध्यादेश की जगह लेने के लिए लाए गए इस बिल की उच्च सदन में राह रोकने के लिए वामपंथी दल, तृणमूल कांग्रेस, जदयू और राजद भी कांग्रेस के साथ हैं। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नहीं है। इसके चलते इस बिल को पारित कराना सरकार के लिए मुश्किल भरा होगा।
कांग्रेस कोयला सुधारों से संबंधित इस बिल को भी प्रवर समिति (सेलेक्ट कमेटी) के हवाले करने की मांग करेगी। इस बिल को रोकने पर अड़ी कांग्रेस का कहना है कि सरकार ने लोकसभा में बिल से जुड़े कुछ प्रावधानों में संशोधन की विपक्ष की मांग को ठुकरा दिया गया था। कांग्रेस को लगता है कि राज्यसभा में बहुमत से दूर सरकार को वह अन्य विपक्षी दलों की मदद से मजबूर कर सकती है। कांग्रेस को बिल के कुछ प्रावधानों पर आपत्ति है। लोकसभा में चर्चा के दौरान कांग्रेस ने एक खास कंपनी को सीधा लाभ पहुंचाने के लिए बिल में प्रावधान करने का आरोप लगाया था।
पार्टी का कहना है कि सरकार ने इस बिल में 1993 से कोयला खनन में लगी कंपनियों के साथ नैसर्गिक न्याय नहीं किया है। हालांकि लोकसभा में सरकार के पास बहुमत होने के कारण कांग्रेस ने इस प्रावधान को हटाने के लिए मतविभाजन की मांग नहीं की थी। मगर अब उसने लोकसभा की कसर उच्च सदन में निकालने की रणनीति बनाई है। बीमा बिल के बाद कोयला बिल भी पास कराना सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। हालांकि सर्वोच्च अदालत के फैसले के अनुसार रद्द कोल ब्लॉकों का नए सिरे से आवंटन करने का रास्ता साफ करने को जारी अध्यादेश को संसद में कानूनी जामा पहनाने में जुटी सरकार विपक्ष के रुख को भांपकर वैकल्पिक रास्ता निकालने में जुट गई है।