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कौन हैं कर्नल निजामुद्दीन, जिनके पैरों में गिर गए मोदी?

Thu, 08 May 2014 07:14 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
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गुरुवार दिन भर चले सियासी ड्रामे के बाद भारतीय जनता पार्टी के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के रोहनिया में चुनावी रैली को संबोधित किया, तो उन्होंने काशी के विकास का मॉडल सामने रखा।
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इसके अलावा काशी के कार्यक्रम को कथित तौर पर रद्द कराने की वजह से मोदी ने मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव पर हमला बोला। और यूपीए सरकार की नाकामियां गिनाते हुए सोनिया-राहुल पर भी व्यंग्यबाण छोड़ें।

नरेंद्र मोदी ने छुए कर्नल के पैर

लेकिन इस रैली में उस शख्‍स पर सबसे ज्यादा निगाहें रहीं, जिनकी उम्र सौ के पार बताई गई। नरेंद्र मोदी ने अपना भाषण शुरू करने से पहले उनके पैर छूकर आशीर्वाद लिया। लेकिन यह शख्स आखिर था कौन?

इन बुजुर्ग शख्स का नाम है कर्नल निजामुद्दीन, जो स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज के सदस्य रहे हैं। बताया जाता है कि उन्होंने साल 2001 में अपनी पहचान जाहिर की।

मोदी ने बताई कर्नल निजामुद्दीन की उम्र

कर्नल निजामुद्दीन सुभाष चंद्र बोस की गाड़ी चलाया करते थे और उन्होंने सिंगापुर में इस फौज का हिस्सा बनने का फैसला किया था। वो 11 भाषाएं जानते हैं और अपने दौर में गजब के निशानेबाज रहे हैं। उन्होंने अंग्रेजों का एक विमान मार गिराया था।

आजमगढ़ के मुबारकपुर में जन्मे कर्नल निजामुद्दीन की मंच पर मौजूदगी ने अचानक सभी को चौंका दिया। लेकिन कुछ देर बाद नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में उनका पूरा ब्योरा बताया।

पिछले साल हुई थी भारत रत्न की मांग

नरेंद्र मोदी ने कहा, "मुझे बताया गया है कि कर्नल निजामुद्दीन की उम्र 103 साल से ज्यादा है और मेरा सौभाग्य है कि वो इतनी दूर से मेरे जैसे आदमी को आशीर्वाद देने आए हैं। मैं उनका आभारी हूं।"

बनारस में मुस्लिम महिला फाउंडेशन की कार्यकर्ताओं ने जनवरी में कर्नल निजामुद्दीन को भारत रत्न देने की मांग करते हुए जुलूस निकाला था। उन्होंने यह मांग भी उठाई थी कि बोस से जुड़ी सारी जानकारियां जनता के सामने रखी जाएं।

सिंगापुर में जुड़े सुभाष चंद्र बोस से

‌कर्नल निजामुद्दीन के मुताबिक उनके पिता इमाम अली सिंगापुर में कैंटीन चलाया करते थे और 24-25 साल की उम्र में वो अपने गांव से भागकर वहां चले गए। उस वक्‍त नेताजी सिंगापुर में आजाद हिंद फौज के लिए युवाओं की भर्ती कर रहे थे। और वो भी शामिल हो गए।

कर्नल के मुताबिक नेताजी उनकी प्रतिबद्धता से बेहद खुश हुए और उन्हें अपना पर्सनल गार्ड-डाइवर नियुक्त कर दिया। उनका दावा है कि वो नेताजी के साथ दस साल रहे।
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12 साल बाद मिला स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा

ऐसा बताया जाता है कि सुभाष चंद्र बोस टोक्यो, नागासाकी, हिरोशिमा, वियतनाम, ‌थाईलैंड, कम्बोडिया, मलेशिया या सिंगापुर जहां भी गए, कर्नल निजामुद्दीन उनके साथ रहे।

वो 5 जून 1969 को अपने गांव लौट आए और तब से वही रह रहे हैं। 2001 में कर्नल निजामुद्दीन ने अपनी पहचान का खुलासा किया, लेकिन प्रशासन ने उन्हें स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा देने में 12 साल का वक्‍त लगा दिया।
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