संसद हमले के आरोपी अफजल गुरु को केंद्र सरकार ने बिना किसी सूचना के आनन-फानन में शनिवार सुबह आठ बजे फांसी दे दी, लेकिन इसके साथ कई सवाल उठ खड़े हुए हैं कि क्या कांग्रेस ने नरेन्द्र मोदी की काट के तरीके आजमाने शुरू कर दिए हैं? चुनावी वर्ष में चौंकाने वाले फैसलों के बीच अफजल गुरू को फांसी देना कहीं सरकार का राजनितिक हथियार तो नहीं है?
2001 में संसद पर हुए हमलों के मुख्य आरोपी अफजल गुरू को सुप्रीम कोर्ट ने 2002 में ही फांसी की सजा मुकर्रर की थी। पूर्व निर्धारित समयसीमा के अनुसार उसे 26 अक्टूबर 2006 को फांसी दी जानी थी लेकिन अफजल के पक्ष में शुरू हुई राजनीतिक मुहिम के कारण उसे फांसी देने में देर होने लगी थी।
गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अफजल को फांसी देने में देर को लेकर केंद्र सरकार की मंशा पर कई बार सवाल भी उठाया। मोदी के आरोपों पर सरकार को कई बार असहज भी होना पड़ा था।
पिछले कई दिनों से मीडिया जगत में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह से छाए हुए थे। संघ के साथ ही बीजेपी ने भी उनके पीएम पद की दावेदारी पर मुहर लगाना शुरू कर दिया था। यही नहीं, दिल्ली के श्रीराम कॉलेज में छात्रों को विकास के गुर सिखाने आए मोदी के बयान को भी मीडिया ने काफी तव्वजो दी। इसके बाद से ही कांग्रेस खेमे में बौखलाहट शुरू हो गई थी।
सूत्रों के अनुसार, अफजल को फांसी देने का फैसला सरकार ने काफी जल्दबाजी में लिया है। इस बात पर मुहर इसी बात से लगती है कि अफजल को फांसी की पुष्टि की खबर देने आए गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे मीडिया से जब मुखातिब हुए तो वह भी सही तरह से अपने बयान में तालमेल नहीं बैठा पा रहे थे।
मीडिया को अफजल की फांसी की जानकारी देने के लिए शिंदे ने पत्रकारों से कहा कि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने 3 फरवरी को अफजल की फांसी की याचिका को वापस किया और इसके बाद 8 फरवरी को उनको फांसी देने का समय तय हुआ, लेकिन वह यह भूल गए की आज आठ नहीं नौ फरवरी है।
बहरहाल, चुनावी वर्ष में सरकार के कुछ और चौंकाने वाले फैसले आ सकते है। राजनीतिक पंडितों के अनुसार कांग्रेस अगर धीरे-धीरे भाजपा से उसके प्रमुख चुनावी मुद्दे छीन लेती है तो कोई आश्चर्य नहीं कहेंगे। इन सबके बीच जो बात सामने आ रही है उसमें कांग्रेस नरेंद्र मोदी के खिलाफ कसाब और अफजल गुरू को मुख्य मुद्दा बना सकती है।