संप्रग सरकार के कार्यकाल में नियुक्त राज्यपालों को हटाने की कोशिशों ने एक बार फिर निजाम बदलने के साथ गवर्नरों को बदले जाने की राजनीतिक बहस छेड़ दी है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2010 में इस खेल पर विराम लगा दिया था।
सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ ने फैसले में कहा था कि मनमाने ढंग से राज्यपालों को हटाया नहीं जा सकता। यदि बाध्यकारी कारणों के बिना राज्यपाल को हटाया गया तो उस निर्णय पर न्यायिक पुनर्विचार किया जा सकता है।
यूपी के राज्यपाल बीएल जोशी इस्तीफा दे चुके हैं। उनके मामले में अब तक आधिकारिक तौर पर कोई विवादित कारण सामने नहीं आया है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
माना जा रहा है कि केंद्र के दबाव के चलते संप्रग के समय नियुक्त अन्य राज्यपाल भी पद छोड़ देंगे। जबकि सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 7 मई, 2010 को व्यवस्था दी थी कि किसी राज्यपाल को सिर्फ बाध्यकारी कारणों से ही बदला जा सकता है और वह भी तब जबकि उनके खिलाफ दुराचरण या अनियमितता का मामला साबित हो चुका हो।
सर्वोच्च अदालत ने कहा था कि राज्यपाल, राष्ट्रपति की ओर से नियुक्त किया जाता है। इसलिए उसे सिर्फ इस आधार पर नहीं हटाया जा सकता कि वह सत्ता में मौजूद पार्टी के अनुरूप नहीं है।
राज्यपाल को सिर्फ बाध्यकारी कारणों से ही हटाया जा सकता है, जो किसी खास मामले में तथ्यों और स्थितियों पर निर्भर करते हैं। अदालत बाध्यकारी कारणों के बिना राज्यपाल को हटाने के मामले में न्यायिक पुनर्विचार कर सकती है।
याचिका पर ही दिया था फैसला
यह महत्वपूर्ण फैसला अदालत ने तत्कालीन भाजपा सांसद बीपी सिंघल की ओर से वर्ष 2004 में दायर जनहित याचिका पर दिया था। सिंघल ने केंद्र में आई संप्रग सरकार के उत्तर प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और ओडिशा के राज्यपालों को हटाए जाने के निर्णय को चुनौती दी थी।
याचिका में कहा गया था कि संवैधानिक प्रावधान की अनदेखी कर केंद्र की सलाह पर राष्ट्रपति राज्यपालों को नहीं हटा सकते थे क्योंकि संविधान में राज्यपालों के लिए पांच साल के तय कार्यकाल का प्रावधान है।
गौरतलब है कि संप्रग सरकार ने भी तब अपनी पूर्ववर्ती एनडीए सरकार में नियुक्त विष्णुकांत शास्त्री, बाबू परमानंद, कैलाशपति मिश्र और केदारनाथ साहनी को उत्तर प्रदेश, हरियाणा, गुजरात और गोवा के राज्यपाल पदों से हटा दिया था।