पिछले वर्ष विश्वकप के लिए रवाना हुई टीम इंडिया को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ट्विटर पर शुभकामना संदेश दिया था। वे संदेश अभूतपूर्व थे, टीम में शामिल सभी खिलाड़ियों के लिए प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया था, कुल 15 ट्वीट। एक ट्वीट पूरी टीम के लिए था, इस प्रकार कुल 16 ट्वीट।
मार्च में इसरायल में लिकुद पार्टी के जीत के बाद उन्होंने बेंजामिन नेतन्याहू को हिब्रू में शुभकामनाएं दी थी। पूर्व क्रिकेटर, कमेंटेटर, चुटकुलों के लिए मशहूर और बीजेपी के पूर्व सांसद नवजोत सिंह सिद्घू को बीमारी के बाद प्रधानमंत्री ने अतिशीघ्र स्वस्थ होने की शुभकामनाएं भी दीं।
संवाद करना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विशेषता रही है। भारत के उन नेताओं में वे रहे हैं, जिन्होंने जनता से संवाद के लिए सोशल मीडिया का सर्वाधिक प्रयोग किया। संवाद के लिए उन्होंने अपनी पार्टी के नेताओं को भी सोशल मीडिया पर आने की नसीहत दी। अपनी चुनावी रैलियों के जरिए उन्होंने संवाद किया। वे जनता से मन की बात भी करते हैं। संवादप्रिय नेता होने के बाद भी दादरी में पिछले दिनों हुई मोहम्मद इखलाक की हत्या पर वह अब तक चुप हैं।
साहित्यकारों ने प्रधानमंत्री की चुप्पी के विरोध में पुरस्कार लौटाने शुरू कर दिए हैं। नयनतारा सहगल और अशोक वाजपेयी ने साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिया है, लेकिन ना सरकार बोल रही और ना प्रधानमंत्री। सवाल ये है कि सरकार सुन भी रही है या नहीं?