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आखिर क्यों आरटीआई से डर रही है मोदी सरकार?

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केंद्र सरकार का मानना है कि राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार(आरटीआई) केदायरे में नहीं लाया जाना चाहिए। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कहा है कि राजनीतिक दलों को आरटीआई केदायरे में लाने से दलों को सुचारू तरीके से काम करने में परेशानी होगी।
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सुप्रीम कोर्ट ने दाखिल हलफनामे में केंद्र सरकार ने कहा है कि केंद्रीय सूचना आयुक्त ने आरटीआई अधिनियम की धारा 2(एच) की व्याख्या बेहद उदारतापूर्ण की और इस नतीजे पर पहुंची कि राजनीतिक दल पब्लिक अथॉरिटी हैं।

सरकार का कहना है कि राजनीतिक दल जन प्रतिनिधि अधिनियम केतहत पंजीकृत होते हैं। अगर इन्हें आरटीआई के तहत लाया गया तो राजनीतिक दलों अपना काम सुचारू रूप से नहीं कर पाएंगे क्योंकि विरोधी गलत मंशा के तहत आरटीआई आवेदन दाखिल करेंगे।
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जहां तक राजनीतिक दलों के वित्तीय पहलू की बात है, यह पहले से ही आयकर अधिनियम के दायरे में है। इतना ही नहीं राजनीतिक दलों द्वारा दी गई जानकारी को निर्वाचन आयुक्त भी वेबसाइट पर जारी करता है।
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सरकार ने कहा

सरकार ने कहा है कि सीआईसी के वर्ष 2013 के उस आदेश को निरस्त करने के लिए 15वीं लोकसभा में विधेयक लाया गया था लेकिन सदन केभंग होने के कारण यह विधेयक पारित नहीं हो सका।

गत सात जुलाई को तमाम राष्ट्रीय दलों को सूचना केअधिकार(आरटीआई) केदायरे में लाने की गुहार संबंधी याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था।

साथ ही अदालत ने  छह राष्ट्रीय दलों भारतीय जनता पार्टी, कांग्रेस, बसपा, सीपीआई, सीपीआईएम और एनसीपी को भी नोटिस जारी किया था।

शीर्ष अदालत एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म नामक संगठन और आरटीआई कार्यकर्ता सुभाष चंद्र अग्रवाल की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।
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सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर रखा अपना पक्ष

याचिकाओं में गुहार की गई है कि राष्ट्रीय दलों को आय और खर्चों का ब्योरा देना चाहिए। केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा तीन जून 2013 को जारी निर्देश के तहत पब्लिक अथॉरिटी सूचना के अधिकार के तहत आती हैं।

याचिका में यह भी कहा गया है कि राजनीतिक दलों को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना चाहिए क्योंकि उनका विधायिका और कार्यपालिका पर नियंत्रण होता है।

पार्टी लाइन से हटकर काम करने पर सांसद और विधायक को अयोग्य घोषित कर दिया जाता है। दलों द्वारा जारी व्हिप सांसदों और विधायकों केलिए बाध्यकारी हो जाता है।

याचिका में विधि आयोग के 255 वें रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया है कि यूनाइटेड किंग्डम, जर्मनी, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस, इटली, ब्राजील, नेपाल आदि कई देशों में राजनीतिक दलों को दिए जाने वाले दान और दानकर्ता को आरटीआई केतहत सार्वजनिक किया जाता है।

भारत में फिलहाल 20 हजार रुपये से कम दान देने वाली संस्था या व्यक्ति के  नाम को सार्वजनिक करने की जरूरत नहीं है। यहीं कारण है कि राजनीतिक दलों को 75 फीसदी फंड अज्ञात स्रोतों से आते हैं। 
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