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मोदी की पकड़ ढीली हुई या मजबूत?

Sat, 20 Sep 2014 03:03 PM IST
आकार पटेल/वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
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इस महीने आए उपचुनाव के नतीजों से साफ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी पार्टी पर कितनी पकड़ है और मतदाताओं पर उनका कितना असर है।
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हालांकि, कुछ महीने पहले हुए लोकसभा चुनावों में जीत के मुक़ाबले उप चुनाव के यह नतीजे कहीं नहीं ठहरते।

इस महीने जिन 33 विधानसभा सीटों पर चुनाव हुए, उनमें भारतीय जनता पार्टी ने अन्य पार्टियों से ज्यादा सीटें जीती हैं।

पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 11 में से तीन सीटों, गुजरात में नौ में से छह सीटों, राजस्थान की चार में से एक सीट और पश्चिम बंगाल और असम में एक-एक सीटों पर जीत दर्ज की है।

लेकिन आम तौर पर यह माना गया कि पार्टी को हार मिली।

स्वशासित राज्यों में मिली थी बड़ी कामयाबी

'द हिंदू' अखबार में छपे एक विश्लेषण में कहा गया है कि भाजपा की हार भारत में सत्तारूढ़ दलों के प्रदर्शन की परंपरा के विपरीत है।

कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने 2004 के विधानसभा उपचुनावों और 2009 में लोकसभा चुनावों में अपने शासन वाले राज्यों में क्रमश- 67 प्रतिशत और 80 सीटों पर जीत दर्ज की थी।

इसके अलावा, इसमें कहा गया है कि उपचुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत 2014 के लोकसभा चुनाव में मिले वोट प्रतिशत से कम हो गया है। भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि ऐसा लगता है कि पार्टी की पकड़ ढीली हो रही है।

यह उपचुनावों का पहला चरण नहीं है, जिसमें भाजपा का प्रदर्शन फ़ीका रहा है। उपचुनावों के पिछले दो चरणों में भी भाजपा संतोषजनक प्रदर्शन नहीं कर पाई है।

नकारात्मक राजनीति

मेरे विचार में भाजपा का शीर्ष नेतृत्व इसे लेकर चिंतित नहीं हैं। इसके क्या कारण हैं, इसे मैं स्पष्ट करूंगा।

लंबे समय से मीडिया के निशाने पर रहने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नतीजों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि उनकी जीत भाजपा की नकारात्मक राजनीति की वजह से हुई है।

उत्तर प्रदेश की भाजपा इकाई लव जिहाद की राजनीति कर रही है। लव जिहाद का मतलब धर्मांतरण के मक़सद से मुस्लिम लड़कों का हिंदू लड़कियों से शादी करना है।

इसके कुछ मामलों को तथ्य के रूप में पेश किए गए, लेकिन, जैसी उम्मीद की जा रही थी, इसकी पुष्टि के लिए पर्याप्त आकड़े मौजूद नहीं थे।

इस मुद्दे का मतदाताओं पर असर नहीं पड़ा। भाजपा को इस मसले को ज़्यादा महत्व नहीं देना चाहिए था, जो उसने दिया।

लेकिन क्या ये उत्तर प्रदेश में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन की वजह थी? मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ, क्योंकि ये नकारात्मक राजनीति जैसा नहीं लगता है।

यूपी में बढ़ा वोट प्रतिशत

उत्तर प्रदेश में मायावती ने उपचुनावों में हिस्सा नहीं लिया था। विश्लेषकों ने बताया कि भाजपा का वोट उत्तर प्रदेश में 5 फ़ीसदी बढ़ा है, इसका मतलब है कि कम से कम बहुजन समाज पार्टी का कुछ वोट तो भाजपा को गया है।

भाजपा के हार के लिए लव जिहाद के राजनीति को ज़िम्मेदार बताते हुए कांग्रेस नेता शकील अहमद ने कहा, "यह भाजपा की नफरत की राजनीति का जवाब है।"

लेकिन भाजपा को मिलने वाले वोट प्रतिशत से ऐसा नहीं लगता है।

राजस्थान में भी उपचुनाव में भाजपा की करारी हार हुई है। मोदी के चुनाव अभियान के दौरान भाजपा ने लोकसभा में राजस्थान की सारी सीटों पर जीत दर्ज की थी। इसलिए विधानसभा के चार में से तीन सीटों पर हुई हार एक बड़ी विफलता की तरह लगती है।

मोदी की लोकप्रियता

हालांकि राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच हमेशा कड़ा मुकाबला रहा है और यह उपचुनाव किसी भी तरह के तत्काल या भविष्य के रुझान को नहीं दिखाता है।

गुजरात जिसे मोदी ने 12 साल तक सींचा है, वहां भी भाजपा के ख‌िलाफ कोई रुझान नहीं दिखता है। पार्टी ने यहां नौ में से छह सीटों पर जीत दर्ज की है।

यह दिखाता है कि कांग्रेस अब भी यहां बाहर है। कांग्रेस को आख‌िरी बार यहां 1985 में बहुमत मिला था।

पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बिना किसी गठबंधन के ऐतिहासिक रूप से एक सीट पर जीत हासिल की है और दूसरी सीट पर दूसरे स्थान पर रही है।

दोनों सीटों पर भाजपा को वामपंथी मोर्चे और कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले हैं। भाजपा अब भारत के बड़े राज्यों में से एक पर अपनी मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है।

और भाजपा का यह उत्थान मोदी की लोकप्रियता की वजह से संभव हो पाया है।
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मोदी ही हैं पार्टी की सही ताकत

कुल मिलाकर व्यक्तिगत तौर पर मोदी के लिए यह खराब परिणाम नहीं हैं। उनकी ग़ैर-मौजूदगी में भाजपा ने कमजोर प्रदर्शन किया है। इससे साबित होता है कि ये उनकी मौजूदगी और नेतृत्व ही है जो भाजपा के वोट प्रतिशत को जीत के करीब लाता है।

उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव में भाजपा का शानदार प्रदर्शन मोदी का करिश्मा और अध्यक्ष अमित शाह के सांगठनिक क्षमता का ही परिणाम था।

उपचुनाव में मिली हार यह दिखाती है कि मोदी का योगदान शाह की तुलना में कहीं ज़्यादा है। भाजपा की सही ताकत का अंदाजा तभी लग सकता है जब मोदी चुनाव के मैदान में उतरे हों।

इस साल के आख‌िर में महाराष्ट्र में होने वाले चुनाव में यह साबित होगा।
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