गुजरात के पोरबंदर में जन्मे महात्मा गांधी को संभवतः केवल एक बात से डर लगता था कि कहीं लोग उन्हें ईश्वर न बना दें। एक ऊंचे चबूतरे पर बिठाकर उनकी पूजा करने लगें। धूप-अगरबत्तियां जलें और उस सतही आस्था के नीचे उनकी मूल बात दब जाए।
ऐसी कोशिशें कई बार हुईं पर गांधी हर दफ़ा उसे विफल करते रहे। जिसने प्रयास किया, डांट सुनी। उस मशहूर घटना में भी, जब एक गांव के सूखे कुएं में अचानक पानी आ गया। गांधी वहां ठहरे थे इसलिए गांववालों ने मान लिया कि गांधी भगवान हैं और उन्हीं की वजह से कुएं में पानी आया है।
वे गांधी को धन्यवाद कहने अगले गांव तक पहुंच गए। थाली, कटोरा और दूसरे बर्तन बजाते हुए। गांधी शोर-शराबे से नाराज़ होकर कुटिया से बाहर निकले और कहा कि वे ईश्वर नहीं हैं। उन्हें धन्यवाद देने की ज़रूरत नहीं है।
मोदी को बना दिया भगवान
इसके बाद उस कृशकाय व्यक्ति ने तर्जनी हवा में लहराते हुए कहा, सुनो! अगर कौआ बरगद के पेड़ पर बैठे और पेड़ गिर जाए तो वह कौए के वज़न से नहीं गिरता।
उसी गुजरात में अब लोगों ने अपने लिए एक नया ईश्वर तलाश कर लिया है। गांव-दर-गांव। शहर-दर-शहर लोग कहते हैं कि नरेंद्र मोदी भगवान हैं। राज्य में न पहले कोई मोदी हुआ है, न आगे होगा। न भूतो न भविष्यति।
फ़र्क केवल इतना है कि इस बार वह केंद्रीय चरित्र इस स्थापना को क़रीब-क़रीब स्वीकार कर लेता है। न कोई डांट-फ़टकार, न चेतावनी। न यह ख़दशा कि उसे इतनी ऊंचाईं पर बिठाया जा रहा है। नरेंद्र मोदी के क़रीबी कहते हैं कि यह अंध आस्था मोदी को असहज करती है। वे इससे खुश नहीं होते।
लेकिन तथ्य ये भी है कि वाराणसी में अपनी लोकसभा उम्मीदवारी के समय लगने वाले 'हर-हर मोदी' के नारे पर वो सार्वजनिक रूप से तब तक आपत्ति नहीं करते जब तक शंकराचार्य उसे अस्वीकार न कर दें।
कुछ साल पहले खड़ी की थी सोशल मीडिया की फौज
इस सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता कि गुजरात में मोदी से ज़्यादा उनकी छवि लोगों के दिलों में बसती है। ज़ुबान उसे दोहराते नहीं थकती और ये मानने में किसी को गुरेज़ नहीं होता कि मोदी उसके सबसे बड़े ब्रांड हैं।
मोदी के नज़दीकी लोग बताते हैं कि नरेंद्र भाई ने इसके लिए ख़ुद लंबी तैयारी की थी। तीन-चार साल पहले से उन्होंने ट्विटर और फ़ेसबुक की ऑनलाइन फ़ौज खड़ी की थी और विधायकों को चेतावनी दी थी कि अगर वे इंटरनेट पर सक्रिय नहीं हुए तो उनका टिकट काट दिया जाएगा।
ये उस वक़्त की बात है जब ज़्यादातर लोगों को इन माध्यमों की ताक़त का अंदाज़ा भी नहीं था। शायद इसी वजह से समर्थन और विरोध के जड़ खांचे हटा देने के बाद सिर्फ़ दो शब्द बचते हैं, जिनसे गुजरात में मोदी की लोकप्रियता की व्याख्या की जा सकती है - असंदिग्ध और आश्चर्यजनक।
असंदिग्ध इसलिए कि कट्टर जातीय समीकरणों के बावजूद उनके धुर विरोधी भी उस छवि से लड़ने को मुश्किल मानते हैं।
मोदी ब्रांड एक सपना
आश्चर्यजनक इसलिए कि वे बेहतर भविष्य की कल्पना इस तरह लोगों पर लादना चाहते हैं कि अतीत ज़मीन में कई फुट नीचे दफ़न हो जाए। लोग सपनों के पीछे भागे और जो हुआ उसे भूल जाएं।
मोदी वडोदरा से भी लोकसभा प्रत्याशी हैं लेकिन वहां सवाल ये नहीं है कि चुनाव का नतीजा क्या होगा। सवाल ये है, और इस पर बड़े पैमाने पर सट्टा भी लग रहा है, कि मोदी वडोदरा में चुनाव प्रचार करने आएंगे या नहीं।
ब्रांड मोदी पर एक सवाल और पूछा जाने लगा है, हालांकि अभी उसकी तीव्रता और आवृत्ति कम है। ये कि नरेंद्र मोदी तो ब्रांड बन गए पर उससे भाजपा को क्या मिला। ये भी कि अगर फ़ायदा सिर्फ़ मोदी को हुआ है तो भाजपा अपने नुक़सान की भरपाई कैसे करेगी।
मोदी ब्रांड से हुआ कांग्रेस को फायदा
गुजरात की छब्बीस संसदीय सीटों के नतीजे पर सबकी नज़र होगी। पिछले विधानसभा चुनाव में, मोदी के ब्रांड बनने की प्रक्रिया के दौरान कांग्रेस का वोट प्रतिशत मामूली बढ़ा है और भाजपा का कम हुआ है।
क्या ब्रांड मोदी इन आंकड़ों को बदल देगा? क्या ये ब्रांड राज्य के जातिगत समीकरण तोड़ देगा? क्या कार्पोरेट मार्का राजनीति पारंपरिक राजनीति पर भारी पड़ेगी? और सबसे बड़ा सवाल ये कि क्या इस ब्रांड की बदौलत भाजपा चुनाव में 'अखंड सौभाग्यवती' होकर उभरेगी?
मोदी के कट्टर समर्थक भी इन सवालों का जवाब आसानी से 'हां' में नहीं दे पाते। वे 26/26 के आंकड़े से इंकार करते हैं। उनके लिए 20/26 ज़्यादा वास्तविक है। इससे ब्रांड को कोई नुक़सान न पहुंचे इसलिए तैयारियां अभी से शुरू हो गई हैं।