नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में 12 साल का कार्यकाल पूरा किया है। उनकी सरकार और भाजपा इस उपलब्धि पर इतराने की कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।
वह निरंतर सरकारों में इतने लंबे वक्त तक सीएम रहने वाले पहले शख्स हैं। इस दौरान उन्होंने न केवल विकास के गुजरात मॉडल को बेचने के लिए हरसंभव कोशिश की, वहीं व्यक्तिगत मोर्चे पर भी लंबी छलांग लगाई है। वह भाजपा के पीएम पद के दावेदार बन गए हैं।
एक सरकारी विज्ञप्ति में कहा गया, "यह एक रिकॉर्ड है...किसी और मुख्यमंत्री ने लगातार 12 साल शासन नहीं किया है।"
रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले बालक से लेकर सियासत की बुलंदियों तक पहुंचे मोदी ने खूब उतार-चढ़ाव देखे हैं। वह प्रचारक के रूप में आरएसएस से जुड़े और वहां से भाजपा में आए।
बीते 12 साल में मोदी बहुत बड़ा नाम बन चुके हैं। इसके पीछे उनकी सरकार की कुछ कामयाबियां तो हैं ही, तो दामन पर पड़े कुछ धब्बे भी हैं। साथ है उनकी शख्सियत, जो एक तबके के लिए करिश्माई है, तो दूसरे कुनबे के लिए सांप्रदायिक राजनीति का चेहरा।
आइए गौर करें, ऐसे मुद्दों पर जिन्होंने मोदी को मोदी बनाया। खास बात यह है कि इन मुद्दों के अक्स में ही उनकी कामयाबी-नाकामी, दोनों नजर आती है।
विकास, विकास, विकास
2002 में दंगों की आंच से दामन पर जो कालिख लगी, मोदी शुरुआत से ही उसे विकास के साबुन धोने की कोशिश में लगे हैं। वह जहां जाते हैं, जब बोलते हैं, विकास की बात करते हैं।
साथ ही गुजरात में हुए विकास को मॉडल की तरह पेश करते हैं और देश से गुहार लगाते हैं कि उन्हें एक मौका दिया जाए, तो विकास के मोदी ब्रांड को वह दूसरी जगह भी लागू कर सकें।
गांव हो या शहरी इलाके, मोदी का दावा रहा कि उनकी सरकार ने 'विकास सबके लिए, तुष्टिकरण किसी के लिए नहीं' की तर्ज पर काम किया।
लेकिन अर्थशास्त्री और अब आरबीआई की कमान संभाल रहे रघुराम राजन की एक रिपोर्ट ने इस दावे की हवा निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
उनकी रिपोर्ट में विकास की रैंकिंग में गुजरात को दूसरे राज्यों से नीचे रखा गया। राजन की अगुवाई वाली कमेटी एक इंडेक्स के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंची, जिसमें प्रति व्यक्ति उपभोग और गरीबी अनुपात जैसे पहलुओं पर गौर किया गया था।
इस रैंकिंग में गोवा और केरल को सबसे ऊपर रखा गया। गुजरात को सबसे कम विकसित राज्यों की श्रेणी में उड़ीसा और बिहार के साथ रखा गया।
निवेश और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश
भारतीय उद्योग जगत लंबे वक्त से मोदी का नाम जप रहा है। उनके मॉडल की तारीफों के पुल बांध रहा है। लेकिन जो चीज उन्हें हकीकत में प्रभावित करती है, वह है फैसला करने में तेजी।
मोदी लालफीताशाही को घटाने और सरकार को ज्यादा सक्रिय बनाने का श्रेय बटोरते हैं। वे खुद इन्हें ग्रोथ के घटक बताते हैं। लेकिन गुजरात हमेशा से इंडस्ट्री की पसंद रहा है, यह भी किसी से छिपा नहीं है।
रायटर के मुताबिक गुजरात की अर्थव्यवस्था मार्च 2002 से अगले आठ साल 10.08 फीसदी की दर से बढ़ी, जो देश की औसत बढ़त दर से ज्यादा है। हालांकि, यह भी सच है कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों ने इस अवधि में भी गुजरात को पीछे छोड़ दिया।
मोदी के गुजरात में बच्चे कुपोषित?
भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी अपने भाषण में नौजवानों और बच्चों पर खास ध्यान देते हैं। लेकिन हाल में कैग ने उन्हें तगड़ा झटका दिया।
वे बच्चों की शिक्षा और भोजन व्यवस्था से जुड़ी योजनाओं को बार-बार रेखांकित करते रहे हैं, इसलिए कैग की रिपोर्ट सवाल उठाती है।
गुजरात में बच्चों के बीच कुपोषण से लड़ने का जिम्मा संभालने वाली इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट स्कीम (आईसीडीएस) पर गुस्सा उतारते हुए कैग ने बताया कि गुजरात में हर तीसरा बच्चा कुपोषित है।
कैग ने अपनी रिपोर्ट में कहा, "सप्लीमेंट्री न्यूट्रिशन प्रोग्राम के तहत यूं तो 223.16 लाख योग्य लाभार्थी हैं, लेकिन इनमें से 63.37 लाख लोगों को छोड़ दिया गया। राज्य में हर तीसरा बच्चा अंडरवेट है।"
चाक-चौबंद सुरक्षा या खामियां?
यह सच है कि गुजरात में 2002 में भड़के दंगों के बाद ऐसी कोई घटना नहीं हुई और कुल मिलाकर राज्य में शांति रही। मोदी इसके लिए अपनी पीठ भी थपथपाते रहे हैं।
भाषणों में पाकिस्तान को निशाने पर लेना और आतंकियों से निपटने की सख्त नीति की जरूरत बताने वाले मोदी इस मामले में भी सरकारी रिपोर्ट से हारते दिख रहे हैं। क्योंकि उनके राज्य में सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने गुजरात की तटीय सुरक्षा स्कीम में कई खामियां पाई हैं, जिसकी समुद्री सीमा पाकिस्तान से लगती है।
कैग की रिपोर्ट में कहा गया है, "पाकिस्तान के साथ समंदर वाले रूट से जुड़े रहने की वजह से गुजरात सामरिक रूप से काफी अहम और संवेदनशील है।"
हालांकि, जिन सुरक्षा उपायों की योजना तैयार की गई थी, उन्हें पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
जाहिर है, मोदी जिन बिंदुओं को लेकर अपनी और अपनी सरकार की पीठ ठोकते हैं, उनमें से कई ऐसे हैं, जिन्हें लेकर कई सवालिया निशान लग सकते हैं।
लेकिन इन तमाम चीजों के बावजूद इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 12 साल में मोदी का कद भारतीय राजनीति बेहद तेजी से बढ़ा है।