शीजा (बदला हुआ नाम) एक 16 वर्षीय बालिका है जो पुणे के स्कूल में पढ़ती है। वह अन्य सहपाठियों की तुलना में सामान्य जीवन नहीं बिता रही है। उसे डर है कि कहीं उसके माता-पिता और रिश्तेदार उसे परेशान न करें क्योंकि उसने मान्यताओं के खिलाफ जाकर शादी के बंधन के बजाय शिक्षा के बंधन को चुना है।
दरअसल जबरदस्ती शादी के लिए बाध्य किए जाने का विरोध कर शीजा ने अपने पिता ही नहीं मराठी समाज को भी नाराज कर दिया है। उसने तारा मोबाइल क्रेच की मदद से शादी के बजाय पढ़ाई का रास्ता तय किया है।
तारा मोबाइल क्रेच की सीईओ प्रनिता मडगाइकर के अनुसार तकरीबन 7 जून को शीजा ने उन्हें फोन किया की उसे मदद की दरकार है और वह शादी के बजाय पढ़ाई करना चाहती है। उसकी शादी 11 जून को थी, इसलिए तुरंत कार्रवाई करना बहुत जरूरी था।
तारा मोबाइल क्रेच एक एनजीओ है जो मजदूरों के बच्चों के लिए कई सेंटर्स चलाती है जब वो काम पर जाते हैं और उनकी पढ़ाई-लिखाई का ख्याल रखती है।
शीजा और तारा का रिश्ता तब से है जब शीजा 9 वर्ष की थी, उसके दादा-दादी ही उसे तारा सेंटर लेकर पहुंचे थे। वह मजदूर थे और शीजा को सेंटर पर छोड़कर काम पर जाते थे। उसके माता-पिता नगर में रहते थे इसलिए शीजा की देखभाल दादा-दादी करते थे।
तारा में अस्सिटेंट ललिता कांबले बताती हैं कि जब शीजा नौ वर्ष की थी तब उसे दो में दाखिल करवाया गया था। वह पढ़ाई में बहुत अच्छी थी इसे देखते हुए उसे रेजिडेंशियल स्कूल में भरती करवा दिया गया ताकि उसे अपने दादा-दादी के साथ बार-बार जगह-जगह भटकना न पड़े।