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पढ़ें, 100 दिनों का मोदी का रिपोर्ट कार्ड

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भारत ही नहीं, किसी भी देश की चुनी हुई सरकार के कामकाज की समीक्षा के लिए सौ दिन पर्याप्त नहीं होते। शुरू के कुछ दिन तो पिछली सरकार के ढर्रे को समझने में ही लगते हैं। लेकिन दो बातें हैं। पहली, सरकार की कुछ शुरुआती पहलों से उसकी आगे की दिशा का पता चलता है।
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दूसरी, जिस तरह नरेंद्र मोदी ने चुनाव से पहले लोगों के मन में अपेक्षा जगाई हैं, उससे उनके सौ दिनों के कामकाज पर भारत के साथ ही दुनिया की कुछ खास नजर रही है। देश में शायद ही किसी सरकार के शुरू के सौ दिन पर इतना गौर किया गया होगा।

ये सौ दिन तो सरकार की मंशा को ही समझने के लिए हैं। सरकार कुछ क्षेत्रों में बहुत सक्रियता दिखा रही है। बाहरी और आंतरिक निवेश जुटाने, पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने या उसे पटरी पर लाने तथा कुछ पुरानी योजनाओं को खत्म कर उनकी जगह नए सिस्टम को अपनाने में सरकार का रुझान दिखता है।
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उसने अपनी तरफ से पहल भी कर दी है। इसे आप भारत को नए ढर्रे पर चलाने की कोशिश भी कह सकते हैं। ऐसे में हर मोड़ पर यही सवाल खड़ा होता है कि बेशक आपके इरादे नेक हों, आप कुछ करना चाहते हों, लेकिन उसे किस तरह करते हैं यह महत्व रखता है।

अगर कार्यकलाप पूरी तरह दुरुस्त न हुआ, तो इसके परिणाम अपेक्षित नहीं आ सकते। आम लोगों को महंगाई, आतंकवाद, काले धन की वापसी, रोजगार पर ठोस कदम उठाने के लिए नई सरकार से अपेक्षाएं होंगी।

'सरकार कुछ बड़े फैसलों की ओर बढ़ी है'

जुमलों में यह ठीक लगता है कि काला धन वापस क्यों नहीं आया या पाकिस्तान को जवाब क्यों नहीं दिया गया। सरकार को कुछ समय मिलना चाहिए। महंगाई कम होने का मतलब केवल यही नहीं कि बाजार की कुछ चीजें सस्ती हो जाएं। महंगाई एकाएक तो बढ़ सकती है, लेकिन एकाएक कम नहीं होती।

सरकार कुछ बड़े फैसलों की ओर बढ़ी है। जन धन योजना लाना और योजना आयोग की जगह दूसरा सिस्टम खड़ा करने की पहल सही मायनों में तभी प्रभाव दिखाएगी, जब उसका क्रियान्वयन बेहतर हो। जन धन योजना में एक दिन में कितने एकाउंट खुले, केवल इस पर खुश नहीं हो सकते।

आगे किस तरह और किस गति से काम चलता है, यह महत्व रखता है। इसी तरह योजना आयोग की जगह एक समानांतर ढांचा खड़ा कर देने और उसका नाम बदल देने से भी बात नहीं बनेगी। सरकार स्मार्ट सिटी बनाने को तूल दे रही है।

निर्माणकारी योजनाओं में पैसा लगेगा तो निश्चित तौर पर रोजगार बढ़ेगा। जहां तक केंद्र और राज्य संबंधों की बात है, तो अभी बहुत अच्छी समझ नहीं दिखी है। सदन में  विपक्ष के नेता का चयन या राज्यपालों की अदलाबदली के संकेत भी अलग है।

पर देखना यह भी होगा कि ऐसे रिश्तों को बेहतर बनाने के लिए हमेशा सरकार ही नहीं, विपक्ष भी जवाबदेह होता है। थोड़ी बहुत कड़ुवाहट तो रहेगी खासकर जब मोदी के पूरे प्रभाव में रंगी सरकार चल रही हो।

मोदी अपने देश की आर्थिक जड़ता को तोड़ें

शायद देश के लोग अभी मोदी की सरकार और संगठन में वर्चस्व वाली शैली को गौर नहीं करना चाहते। उनकी इच्छा यही है कि मोदी अपने देश की आर्थिक जड़ता को तोड़ें। समृद्धि लाएं। रोजगार बढाएं।

एक बात का उल्लेख जरूर करना चाहता हूं कि मोदी ने पंद्रह अगस्त के भाषण में साफ-सफाई की बात की थी। प्रधानमंत्री का आह्वान एक औपचारिकता नहीं है। वास्तव में यहां लोगों को संजीदगी के साथ जीवन शैली में बदलाव लाना होगा।

कोई भी सरकार चाहे गंगा सफाई अभियान या स्मार्ट सिटी के लिए कितनी बातें करें, लेकिन अगर लोगों की सहभागिता नहीं है, तो उसके परिणाम नहीं मिल सकते।

जहां तक भाजपा सरकार के वैचारिक आवरण की बात है, तो समय समय पर संगठन के लोग, कुछ सांसद उलझाने वाली टिप्पणी तो कर देते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं दिखी है। बस मैं यही कहूंगा कि इस सरकार को नंबर देने में थोड़ा इंतजार करें।
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कई पड़ोसी देशों से दोस्ताना माहौल बना है

मई में मोदी सरकार ने जताना चाहा कि पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को बेहतर बनाने में उसका खास रुझान है। न्योता पाकिस्तान को भी भेजा गया। और कुछ हाथ मिलाने में गर्माहट का अहसास भी था।

लेकिन जहां नेपाल, जापान, थाइलैंड, भूटान जैसे पड़ोसी देशों के प्रति दोस्ताना माहौल बना है, वहीं पाकिस्तान और बांग्लादेश के मामले में चीजें जहां की तहां हैं। खासकर पाकिस्तान के साथ सही ट्यूनिंग नहीं हो पा रही है। पाकिस्तान के अंदरूनी हालात भी इसके लिए जिम्मेदार कहे जा सकते हैं, लेकिन भारत सरकार के लिए यह सबसे बड़ी कसौटी है।

चीन और अमेरिका भी जरूरी
जापान में सरकार के मुखिया मोदी अगर चीन पर किसी टिप्पणी से बचे हैं, तो यह अच्छा है। भारत को अपने संसाधनों, बाजार और निवेश के लिए चीन की ओर भी देखना है। यही स्थिति अमेरिका के साथ रिश्तों को लेकर भी है, जहां मोदी को जल्दी जाना है।

(वेद विलास उनियाल से बातचीत के आधार पर)
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