पूरे देश में एक दशक तक हिंसा फैलाने के बाद आखिरकार माओवादियों का आंदोलन कमजोर पड़ता नजर आ रहा है। इस बात की पुष्टि सीपीआई (माओवादी) की केन्द्रीय समिति ने खुद की है।
सीपीआई माओवादी की केंद्रीय समिति ने खुद माना है कि अपने संघर्ष में अब हमें लोगों की कम संख्या खलने लगी है। हमारा साथ देने वाले लोगों की संख्या कम हुई है। वहीं हथियारों की स्थिति भी एकदम जर्जर हो चुकी है।
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक सीपीआई (माओवादी) की केन्द्रीय समिति ने माना है कि देश भर में मध्यम वर्ग और बुद्घिजीवियों से मिलने वाले समर्थन में गिरावट आई है।
सीपीआई (माओवादी) 21 सिंतबर को अपनी स्थापना की दसवीं वर्षगांठ मना रही है। 21 सितंबर को देश भर में बहुत बड़े स्तर पर आयोजन करने की संभावना है।
अपना जनाधार बढ़ाने के लिए अब केन्द्रीय समिति भविष्य में नई रणनीति के तहत काम करेगा।
यह बात सीपीआई (माओवादी) के 11 पेज के एक प्रस्ताव में सामने आई है।
केन्द्रीय समिति ने यह स्वीकार किया है कि महाराष्ट्र में लगातार हमारे साथियों की गिरफ्तारी से हमें बड़ा झटका लगा है।
उत्तर भारत में माओवादी नेटवर्क को भी काफी नुकसान पहुंचा है।
पूर्वोत्तर भारत के असम, दक्षिण भारत में कर्नाटक और तमिलनाडु में भी आंदोलन को काफी नुकसान पहुंचा है।
माओवादी नेता किशनजी के एनकाउंटर के बाद से आंदोलन को बड़ा झटका लगा है।