लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस के भीतर निराशा का माहौल है। वरिष्ठ नेताओं में बेचैनी है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और निवर्तमान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भरोसेमंद माने जाने वाले पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और कांग्रेस नेता अश्वनी कुमार का कहना है कि वक्त आ गया है कि कांग्रेस में अब बुनियादी रूप से ढांचागत बदलाव होना चाहिए और सोनिया गांधी को एक बार फिर पूरी कमान अपने हाथ में लेनी चाहिए।
अमर उजाला के सलाहकार संपादक विनोद अग्निहोत्री को दिए विशेष साक्षात्कार में अश्वनी कुमार ने यह भी कहा कि कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता की नीति को विपक्ष ने अल्पसंख्यकवाद या मुस्लिम परस्ती केरूप में प्रचारित किया, जिससे भाजपा हिंदू ध्रुवीकरण करने में सफल रही। इसे दुरुस्त करने की जरूरत है।
पूर्व कानून मंत्री के मुताबिक कांग्रेस में गुटबाजी और भितरघात चरम पर है, इसे फौरन खत्म किया जाना चाहिए। अश्वनी के मुताबिक कांग्रेस में हार की जवाबदेही तय की जाए और उन रणनीतिकारों जिनकी वजह से पार्टी भ्रम में रही,को बदले जाने की जरूरत है।
सोनिया युग में लौटना पड़ेगा
सवाल-कांग्रेस की इस शर्मनाक हार के बाद पार्टी को क्या सबक लेना चाहिए?
जवाब-हार के कारणों का पूरा विश्लेषण अभी होना है। लेकिन इस हार का सबसे बड़ा सबक है कि पार्टी को फिर सोनिया युग में लौटना पड़ेगा और हर अहम फैसले में उनकी ही छाप होनी चाहिए।
संकट की इस घड़ी में कांग्रेस केसामने सोनिया गांधी का प्रभावशाली नेतृत्व ही एकमात्र विकल्प है। साथ ही पार्टी के भीतर चलने वाले भितरघात और गुटबाजी केखेल को रोका जाना चाहिए। कांग्रेस को बचाना जरूरी है, क्योंकि कांग्रेस का खत्म होना लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
'सोनिया गांधी ने खुद को थोड़ा पीछे कर लिया'
सवाल: लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष तो सोनिया गांधी ही हैं और उनकी अध्यक्षता में ही पार्टी बुरी तरह हारी है?
जवाब- सोनियो गांधी ने ही पार्टी को उस बुरे दौर से बाहर निकाला था और 2004 में केंद्र में कांग्रेस की सत्ता में वापसी उनके नेतृत्व में ही हुई और दस वर्ष तक यूपीए ने सफल सरकार चलाई।
लेकिन पिछले कुछ समय से सोनिया गांधी ने खुद को थोड़ा पीछे कर लिया था और पार्टी के फैसलों पर उनकी छाप वैसी नहीं दिखाई पड़ी जैसी कि पहले दिखती थी।
'राहुल गांधी ने कांग्रेस को नया जोश दिया'
सवाल: क्या आपके कहने का मतलब है कि राहुल गांधी को आगे करके लोकसभा चुनाव लडऩे का प्रयोग विफल रहा?
जवाब: नहीं ऐसा बिल्कुल नहीं है। राहुल गांधी ने कांग्रेस को नया जोश दिया। उन्होंने चुनाव में बहुत मेहनत की । मेरा कहना है कि सोनिया जी के साथ मिलकर राहुल को पार्टी में अहम भूमिका होगी। लेकिन पार्टी के पिछले फैसलों में जिन लोगों की भूमिका थी उनकी जवाबदेही जरूर तय होनी चाहिए।
'प्रियंका एक चमत्कारिक व्यक्तित्व रखती'
सवाल: क्या प्रियंका गांधी को पार्टी में अब आगे लाने का वक्त आ गया है?
जवाब:निश्चित रूप से प्रियंका एक चमत्कारिक व्यक्तित्व रखती हैं। लेकिन उनकी भूमिका राजनीति और पार्टी में क्या हो, इसका फैसला हमें उन पर और परिवार पर छोडऩा चाहिए।
सवाल: आपकी नजर में इस बुरी चुनावी हार की क्या वजह रही?
जवाब: मेरी निजी राय है कि हम देश के बदलते मानस को नहीं समझ सके। बदले सियासी अहसास को नहीं माप सके। हार का अनुमान तो था, लेकिन इतनी बुरी हार का अंदाजा नहीं था।
जनता और विशेषकर युवाओं के साथ हमारे संवाद और संचार की रणनीति पूरी तरह विफल रही। हमारे चुनाव प्रचार के नारे लोगों केगले नहीं उतरे, जबकि भाजपा के नारे लोगों की दिलों में उतर गए और जबान पर चढ़ गए। हम जमीनी हकीकत से कहीं दूर रह गए।
'उनकी राजनीतिक नासमझी भी हो सकती है'
सवाल: इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानेंगे?
जवाब: इस हार के लिए पार्टी के वह रणनीतिकार जिम्मेदार हैं जिन्होंने यह भ्रम बनाए रखा कि किसी न किसी तरह देश में धर्मनिरपेक्ष दलों की मिलीजुली सरकार बन जाएगी। यह उनकी राजनीतिक नासमझी भी हो सकती है। लेकिन ऐसे लोगों की पहचान करके उनकी जवाबदेही तय होनी चाहिए और उनकी जगह ऐसे चिंतनशील लोगों को आगे लाना चाहिए जो देश केमानस को समझने में समर्थ हों और आगे आने वाली चुनौतियों का सामना कर सकें।
सवाल: क्या धर्मनिरपेक्षता पर जरूरत से ज्यादा जोर देना भी नुकसानदेह रहा?
जवाब:धर्मनिरपेक्षता कांग्रेस की वैचारिक प्रतिबद्धता है। लेकिन कांग्रेस की धर्मनिरपेक्षता को अल्पसंख्यकवाद या मुस्लिमपरस्ती केरूप में भाजपा ने प्रचारित किया, जिसका हम माकूल जवाब नहीं दे सके। इससे कांग्रेस के बारे में एक गलत धारणा बन गई, जिसने देश के बहुसंख्यकों को आहत किया और भाजपा हिंदू ध्रुवीकरण में कामयाब हो गई। इस धारणा को प्रभावशाली तरीके से दुरुस्त करने की जरूरत है।
'कांग्रेस नेताओं का आम कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद जरूरी'
सवाल: क्या पुराने लोगों की किनारे करने का भी यह नतीजा है?
जवाब: पार्टी में नए लोगों को आगे लाया जाना चाहिए लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि पुराने अनुभवी लोगों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए और साफ सुथरी छवि केलोगों को ही प्रमुख जिम्मेदारी देनी चाहिए।
सवाल: आखिर कांग्रेस जो देश की सबसे पुरानी पार्टी है, उसका नेतृत्व जनता का मानस समझने में नाकाम क्यों रहा?
जवाब:लोकतांत्रिक राजनीति में जनता केसाथ भावनात्मक रिश्ता जरूरी है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि पहले पार्टी केभीतर नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच यह भावनात्मक रिश्ता हो। तभी जनता के साथ यह रिश्ता मजबूत होता है, क्योंकि कार्यकर्ता ही नेतृत्व और जनता केबीच की कड़ी है।
इसके लिए जरूरी है कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पार्टी में हर स्तर पर सम्मान मिले। कांग्रेस नेताओं का आम कार्यकर्ताओं से निरंतर संवाद जरूरी है। इसके लिए पार्टी नेताओं को अपनी कार्यशैली और सोच बदलनी होगी। अनुशासन जरूरी है पर अनुशासन के नाम पर विचारों पर अंकुश लगाने से कांग्रेस जैसी जिंदा पार्टी भी मुर्दा हो जाएगी।
'मतलब यह नहीं कि सिर्फ टोपियां बदल दी जाएं'
सवाल: पार्टी संगठन में क्या बदलाव होना चाहिए?
जवाब: कांग्रेस में ढांचागत सुधार और बदलाव बेहद जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सिर्फ टोपियां बदल दी जाएं। अब इससे काम नहीं चलेगा।
नौकरीपेशा लोगों की बजाय पुराने भरोसेमंद राजनीतिक लोगों की भूमिका बढऩी चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया ज्यादा लोकतांत्रिक हो। मीडिया और प्रचार की रणनीति बदलने की जरूरत है और ऐसे नेताओं को पार्टी का चेहरा बनाना होगा जिनकी साफ सुथरी छवि और जनता में ज्यादा स्वीकार्यता हो।
प्रदेश इकाइयों को मजूबत करने और वहां उन नेताओं को जिम्मेदारी देने की जरूरत है जो ज्यादा मेहनत कर सकेंऔर जिनकी कार्यकर्ताओं और जनता पर अच्छी पकड़ हो। जिन राज्यों में पार्टी बुरी तरह हारी है, वहां की प्रदेश इकाइयों में तत्काल फेरबदल किया जाना चाहिए।