सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शादी का झूठा वादा कर युवती से शारीरिक संबंध बनाना नि:संदेह बलात्कार की श्रेणी में आता है। लेकिन अभियुक्त को तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब यह साबित हो कि युवती के साथ उसके संबंध दुर्भावनापूर्ण थे।
यदि युवक विवाह का पक्का इरादा रखता है और किसी कारणवश परिणय सूत्र में नहीं बंध सके तो ऐसा मामला बलात्कार की श्रेणी में नहीं आता।
सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि कोई भी अदालत युवक को तभी दोषी ठहरा सकती है, जबकि इसका पुख्ता प्रमाण हो कि अभियुक्त शादी का इच्छुक नहीं था और उसका इरादा सिर्फ शारीरिक शोषण का था।
जस्टिस बीएस चौहान और जस्टिस दीपक मिश्र की पीठ ने पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट और करनाल ट्रायल कोर्ट की ओर से दीपक गुलाटी के लिए मुकर्रर की गई सात साल की सजा को दरकिनार करते हुए यह स्पष्ट किया है।
पीठ ने कहा कि उन्नीस साल की युवती एक बार नहीं, बल्कि तीन-चार बार युवक के साथ अपनी सहमति से बाहर गई। उसके पिता की शिकायत पर करनाल पुलिस ने अपहरण का मुकदमा दर्ज किया।
अभियुक्त को कुरुक्षेत्र के बस अड्डे से उस समय गिरफ्तार किया गया जब वह युवती के साथ कोर्ट मैरिज के लिए अंबाला जा रहा था। बरामदगी के बाद लड़की ने युवक पर बलात्कार का आरोप लगा दिया। लड़की ने कहा कि दीपक ने शादी का झांसा देकर उससे यौन संबंध स्थापित किए।
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि पूरे घटनाक्रम पर नजर डालने के बाद साफ है कि मामले में बलात्कार के मूल तत्व मौजूद नहीं है। शादी का झांसा देकर बलात्कार का आरोप लगाया गया और निचली अदालत ने अपहरण के अलावा बलात्कार के आरोप में आईपीसी की धारा 376 के तहत अभियुक्त को सात साल की सजा दे दी।
अभियुक्त अभी तक तीन साल जेल में गुजार चुका है। लेकिन बलात्कार का आरोप निराधार है।
बारहवीं की छात्रा और अभियुक्त के बीच घनिष्ठता के ठोस सबूत हैं। दोनों मई 1995 में करनाल से कुरुक्षेत्र गए। वहां तीन-चार दिन रहे। उसके बाद युवती कुरुक्षेत्र में एक कॉलेज के हॉस्टल चली गई। फिर हॉस्टल से निकलकर वह युवक के साथ चली गई।
दोनों के बीच सहमति से शारीरिक संबंध स्थापित करने के पर्याप्त सबूत हैं। अपने परिवार से अलग होकर अभियुक्त के साथ लगातार कई दिन गुजारने के बाद भी उसने बलात्कार का आरोप नहीं लगाया।
शीर्षस्थ अदालत ने कहा कि झूठा आश्वासन देकर शारीरिक संबंध बनाना नि:संदेह बलात्कार के श्रेणी में आता है लेकिन मौजूदा मामले में अभियुक्त ने शादी से इंकार नहीं किया। ऐसे में अदालतों को इस बात गौर करना चाहिए कि अभियुक्त का इरादा वाकई छलकपट के जरिए अपनी हवस पूरी करना नहीं था।
अभियुक्त का तभी दोषी ठहराया जा सकता है जब यह साबित हो जाए कि युवती के साथ उसके संबंध दुर्भावनापूर्ण थे।