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प्राइम टाइम में दिखाओ मराठी फिल्में: महाराष्ट्र सरकार

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जल्द ही महाराष्ट्र के मल्टीप्लेक्सों को प्राइम टाइम यानी शाम छह से रात नौ बजे के शो में एक मराठी फिल्म को जगह देनी पड़ेगी। राज्य सरकार ने यह फैसला किया है।
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राज्य के शिक्षा, संस्कृति और मराठी भाषा मंत्री विनोद तावड़े ने मंगलवार को यह घोषणा की। सरकार के इस फैसले का फिल्म इंडस्ट्री में कुछ लोगों ने स्वागत किया है। परंतु मल्टीप्लेक्स इंडस्ट्री ने चुप्पी साध ली है।

तावड़े ने विधानसभा में राज्य के ऐतिहासिक किलों, मराठी भाषा और संस्कृति पर सवालों का जवाब देते हुए सरकार के इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जल्द ही इस मामले में कानून लाने वाली है। तावड़े के अनुसार इस मुद्दों पर राजस्व और गृह विभाग से चर्चा कर ली गई है।
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फाल्के पर शॉर्ट फिल्म भी दिखानी होगी

शिक्षा, संस्कृति और मराठी भाषा मंत्री विनोद तावड़े ने यह भी कहा कि भारतीय सिनेमा के पितृपुरुष दादा साहब फाल्के पर राज्य सरकार एक शॉर्ट फिल्म बनाने की तैयारी कर रही है, इसे फिल्म शुरू होने से पहले सभी सिनेमाघरों को दिखाना पड़ेगा। अभी महाराष्ट्र में फिल्म के प्रदर्शन से पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य है।

मराठी फिल्मों को बढ़ावा देने के लिए यह पहला प्रयास नहीं है। इससे पहले 2010 में कांग्रेस-एनसीपी सरकार ने भी ऐसी कोशिश की थी और मल्टीप्लेक्सों के लिए सुबह नौ से रात के नौ के बीच कोई एक शो मराठी फिल्म के लिए अनिवार्य रूप से दिखाने का आदेश जारी किया था, लेकिन वह आदेश कागजों में ही रह गया था।

भाजपा-शिवसेना सरकार के इस फैसले पर मल्टीप्लेक्स मालिकों और उनके प्रवक्ताओं ने चुप्पी साध ली है। वे इस फैसले के विस्तार से सामने आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि क्या सरकार प्राइम टाइम में मराठी फिल्म की बाध्यता के साथ उन्हें टेक्स में किसी तरह की रियायत या अन्य सब्सिडी देगी?
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मल्टीप्लेक्सों ने साधी चुप्पी

उधर, बॉलीवुड में इस फैसले पर अलग-अलग राय सामने आई है। हिंदी फिल्मों में काम करने वाले और पिछले दिनों लय भारी जैसी सफल मराठी फिल्म के निर्माता-अभिनेता रितेश देशमुख ने इस फैसले का स्वागत किया है।

भट्ट कैंप से जुड़े विक्रम भट्ट का कहना है कि इस फैसले से मराठी फिल्मों का भला नहीं होगा, क्योंकि फिल्म वही चलती है, जो अच्छी होती है। निर्देशक हंसल मेहता के अनुसार इस तरह के फैसले ठीक नहीं हैं। फिल्मों को क्षेत्रीय आधार पर बांट कर नहीं देखा जा सकता।

उधर, मराठी फिल्मकारों ने इस फैसले का स्वागत किया है। पिछले साल सर्वश्रेष्ठ पहली फिल्म के निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार जीतने वाले नागराज मंजुले के अनुसार, ‘यह अच्छा फैसला है। इससे उन मराठी फिल्मों को लाभ होगा, जो अच्छी होती हैं, मगर जिन्हें प्राइम टाइम में जगह नहीं मिल पाती है।’

मराठी सिनेमा का बढ़ता कारोबार
-मराठी फिल्म उद्योग आज 400 करोड़ रुपये सालाना का है और 25 प्रतिशत प्रति वर्ष की रफ्तार से बढ़ रहा है।
-राज्य सरकार दो विभिन्न स्लैबों में मराठी फिल्मों को क्त्रस्मश: 40 लाख और 35 लाख रुपये की सब्सिडी देती है।
-जिस मराठी फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलता है, उसके निर्माता को राज्य सरकार 15 लाख रुपये का इनाम देती है।
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