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आडवाणी को नहीं मिल रहा है 'अपनों' का साथ

Tue, 11 Jun 2013 12:14 AM IST
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
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नरेंद्र मोदी के खिलाफ इस्तीफे को ब्रह्मास्त्र बनाने वाले भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को पार्टी नेताओं की सहानुभूति तो मिल रही है, मगर खुलकर समर्थन नहीं।
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पार्टी में दूसरी बार अलग-थलग पड़े आडवाणी के दांव ने समर्थकों को भी असमंजस में डाल दिया है। हालांकि उन्हें मनाने की जोर-शोर से कोशिश जरूर हो रही है, मगर आडवाणी खेमे का एक भी नेता खुलकर उनका साथ देने से कतरा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि अंदरखाने सुषमा स्वराज और वेंकैया नायडू जरूर विवाद में बीच का रास्ता निकालने में जुटे हैं।

आडवाणी खेमे के अन्य नेताओं में शुमार जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, अनंत कुमार और उमा भारती फिलहाल देखो और इंतजार करो की रणनीति पर काम कर रहे हैं।

दरअसल पार्टी को अटल-आडवाणी की छाया से बाहर निकालने की योजना और रणनीति राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की थी। पार्टी ने गोवा कार्यकारिणी में मोदी को पार्टी का नया चेहरा बनाकर इस आशय का साफ संकेत दे दिया था।
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सूत्रों के मुताबिक सोमवार को दिए गए आडवाणी के इस्तीफे पर संघ का रुख बेहद कड़ा है। संघ का सीधा निर्देश है कि पार्टी आडवाणी को मनाने की हर संभव कोशिश करे, मगर गोवा में लिए गए फैसले से पलटने की शर्त किसी कीमत पर न मानी जाए।

अब आडवाणी खेमे की दिक्कत यह है कि कोई भी नेता खुलकर आडवाणी का साथ देकर मोदी और संघ की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहता। यही कारण है कि आडवाणी खेमे के नेता अभी शांत हैं।

आडवाणी खेमे में शामिल कुछ नेताओं की कुछ दूसरी भी समस्याएं हैं। इनमें से कई खुद को प्रधानमंत्री पद का दावेदार मानते हैं।

इन्हें लगता है कि गठबंधन सरकार बनाते समय उनकी भी लॉटरी लग सकती है। हालांकि इसके लिए सबसे पहले संघ के आशीर्वाद की जरूरत है।

इसके अलावा इस खेमे के कई नेता पार्टी में बने नए समीकरण को भांप रहे हैं। नई परिस्थितियों में पार्टी में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका बनाए रखने के लिए ऐसे नेता मोदी से सीधा टकराव मोल नहीं लेना चाहते।
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वैसे भी बदली परिस्थितियों में उमा भारती और यशवंत सिन्हा पहले ही सार्वजनिक तौर पर यू टर्न ले चुके हैं। यह स्थिति आडवाणी के लिए प्रतिकूल है।

बहरहाल मोदी के साथ इस अंतिम लड़ाई में आडवाणी को अंदरूनी सहानुभूति तो मिल रही है पर खुला समर्थन दूर दूर तक नहीं दिख रहा।
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