बहुचर्चित एवं विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक मंगलवार को संशोधनों के साथ लोकसभा में भारी बहुमत से पास हो गया। बिल के खिलाफ विरोध को थामने के लिए केंद्र ने अपनी ओर से खुद नौ संशोधन रखे, इसके बावजूद वह विपक्षी दलों को मनाने में नाकाम रही।
केंद्र सरकार में शामिल शिवसेना और स्वाभिमान पक्ष ने मतदान में बिल पर सरकार का साथ ही दिया। जहां कांग्रेस, बीजद, सपा और तृणमूल कांग्रेस ने बिल को किसान विरोधी बताते हुए सदन से बहिर्गमन किया, वहीं जदयू और वाम दलों ने बिल का जमकर विरोध किया।
ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह द्वारा सोमवार को पेश भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता अधिकार (संशोधन) विधेयक, 2015 पर लगभग नौ घंटे की लंबी चर्चा हुई। इस बिल को मंगलवार को मतदान के जरिये लोकसभा में पारित किया गया।
कांग्रेस, बीजद और तृणमूल कांग्रेस ने किया बहिर्गमन
सरकार की ओर से बिल में किए गए संशोधनों की जानकारी खुद बीरेंद्र सिंह ने सदन को दी। इससे पहले बिल पर चर्चा के दौरान पक्ष-विपक्ष की ओर से एक-दूसरे पर जमकर सियासी तीर चले। विपक्ष ने इसे किसान विरोधी बताते हुए विरोध किया तो बिल के पक्ष में आवाज बुलंद करते हुए सरकार और उसके सहयोगी दलों ने विकास के लिए जरूरी बताया।
चर्चा का जवाब देते हुए ग्रामीण विकास मंत्री ने विपक्ष पर पलटवार करते हुए कहा कि वे बिल में किसानों की आत्मा डालने का प्रयास कर रहे हैं। किसानों के प्रति भावना दिखाते हुए कहा कि वे किसानों के हक की लड़ाई लड़ने वाले सर छोटू राम के परिवार से हैं। उनके रहते हुए किसानों का हक नहीं छीना जा सकता है।
विपक्ष पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि किसान हितैषी बनने वाले लोग गलत प्रचार कर रहे हैं। कांग्रेस पर हमला बोलते हुए चौधरी बीरेंद्र सिंह ने कहा कि पांच दशक के शासन में इन्होंने किसानों को उपयोग की वस्तु बनाकर रखा।
पक्ष विपक्ष में जमकर हुई नोकझोंक
उन्होंने सपा को भी घेरा और कहा कि जमीन अधिग्रहण के मामले में उत्तर प्रदेश में सब कुछ सही नहीं है। कांग्रेस नेता दीपेंद्र हुड्डा ने बिल का विरोध करते हुए कहा कि बहुमत के घमंड में सरकार किसानों का हक छीन रही है। उन्होंने मोदी सरकार पर कॉरपोरेट हितैषी होने का आरोप लगाया।
कांग्रेस सांसद अखिल गोगोई ने बिल का विरोध करते हुए यूपीए के 2013 वाले बिल के लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तारीफ की।
अकाली दल के सुखदेव सिंह ढींढसा ने भी सरकार से सामाजिक प्रभाव और किसानों की सहमति बहाल करने के प्रावधान की बात करते हुए पंजाब के कानून पर चलने को कहा। भाकपा सांसद की ओर से विधेयक को रद्द करने की मांग उठी थी मगर मतदान में मांग खारिज हो गई।
बिल में ये किए संशोधन
नए संशोधनों के मुताबिक सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट के लिए अधिग्रहण नहीं किया जाएगा, किसानों की बहुफसली जमीन नहीं ली जाएगी, निजी अस्पताल और शिक्षण संस्थाओं के लिए सरकारी अधिग्रहण नहीं, किसानों को अपील का अधिकार, परिवार के एक सदस्य को नौकरी, इंडस्ट्रियल कॉरिडोर के लिए सीमित जमीन का प्रावधान, संशोधन के बाद कॉरिडोर के दोनों तरफ एक-एक किमी की जमीन का अधिग्रहण किया जाएगा और बंजर जमीनों का अलग से रिकॉर्ड रखा जाएगा, कानूनी समय को बाहर करते हुए पांच साल के बाद भूमि वापस करने का प्रावधान और धारा 105 में एक साल के बाद शामिल किए जाने वाले एक्ट के 13 प्रावधानों को शामिल किया गया है।
राजग के सहयोगी स्वाभिमान पक्ष का संशोधन खारिज: केंद्र सरकार की सहयोगी पार्टी स्वाभिमान पक्ष ने भी एक संशोधन पेश किया लेकिन इसे भी खारिज कर दिया गया।
विपक्ष के 52 संशोधन नकारे गए: विपक्षी सांसदों द्वारा लाए गए 52 संशोधन या तो खारिज कर दिए गए या फिर इन्हें लाने वाले सांसदों द्वारा इन पर दबाव नहीं डाला गया।
असली अग्निपरीक्षा राज्यसभा में: केंद्र सरकार ने भले ही बिल को लोकसभा से भारी बहुमत से पारित करा लिया हो लेकिन उसकी असली अग्निपरीक्षा राज्यसभा में होगी। दरअसल राज्यसभा में राजग अल्पमत में है और विपक्ष बहुमत में है।
ऐसे में इस बिल के वहां से पारित होने की कम ही संभावना नजर आ रही है। हालांकि सरकार के रणनीतिकार सपा, बसपा और तृणमूल कांग्रेस पार्टी को बिल के समर्थन के लिए मनाने में जुटे हुए हैं।