फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इंदिरा गांधी के एक शब्द ने देश में ला दी संचार क्रांति

विज्ञापन
विज्ञापन
21 मई, 1991, रात के ग्यारह बजे थे। सैम पित्रोदा गहरी नींद में थे। अचानक उनकी पलंग के बगल में रखा टेलिफोन बजा। दूसरे छोर पर एक पत्रकार मयंक छाया थे। मयंक सीधे प्वाइंट पर आए। उन्होंने पूछा, "क्या आपको जानकारी है कि राजीव गाँधी की हत्या कर दी गई है?" पित्रोदा ये सुन कर सन्न रह गए।
विज्ञापन


मयंक बताते हैं कि उस दिन मैंने पहली बार किसी की तकलीफ को टेलिफोन पर महसूस किया। सैम के मुँह से गुजराती में निकला, "ना, ना, होए (नहीं ये नहीं हो सकता)।" रिसीवर रखते ही सैम ने मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को फोन मिलाया। शेषन ने बताया कि ये खबर सही है।

सैम को याद आने लगा कि तमिलनाडु के चुनाव प्रचार पर निकलने से पहले राजीव के सचिव विंसेंट जॉर्ज ने उनसे फोन कर पूछा था क्या आप राजीव से मिलना चाहेंगे। सैम ने जवाब दिया था राजीव कुछ घंटों के लिए दिल्ली आए हैं। उनका अपने परिवार के साथ समय बिताना मुझसे मिलने से ज्यादा जरूरी है।
विज्ञापन

इंदिरा के सामने देना था प्रेजेंटेशन

सैम याद करते हैं, "मैं कैसे सोच सकता था कि अब मैं उनसे कभी नहीं मिल पाउंगा।" असल में सैम पित्रोदा राजीव से मिल कर उनके दोबारा प्रधानमंत्री बनने की स्थिति में उन्हें उनके पहले 30 दिनों के कामकाज का ब्लू प्रिंट देने वाले थे।

पित्रोदा 1981 से पहले राजीव गांधी का नाम तक नहीं जानते थे। वो एक अरबपति शख्स थे जो शिकागो में रहते थे और उनके नाम दूरसंचार से संबंधित 50 पेटेंट दर्ज थे। 1981 की नवंबर की एक शाम सैम पित्रोदा ताजमहल होटल के अपने कमरे में बैठे कुछ कागजो पर बोल्ड शब्दों में बेतहाशा लिखते चले जा रहे थे। उन्होंने 68 पेज भर दिए थे। बीच बीच में वो एक दो डायग्राम भी बना रहे थे।

कुछ घंटों बाद उन्हें अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण प्रेजेन्टेशन देना था, वो भी भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सामने। बहुत कोशिशों के बाद इंदिरा गांधी के सचिव पीसी एलेक्जेंडर ने उन्हें इंदिरा के साथ दस मिनट का समय दिया था। सुनते ही सैम का मुंह लटक गया था और वो बोले थे, "दस मिनट में मैं अपनी बात नहीं कह पाऊँगा। मुझे कम से कम इंदिरा गाँधी के साथ साठ मिनट चाहिए।"

'महिला को पहली नजर में प्यार हो जाता'

उस समय सिर्फ दो ही शख्स थे जो इंदिरा गांधी से बिना किसी पूर्व अपॉएंटमेंट के मिल सकते थे। एक थे आरके धवन और दूसरे राजीव गाँधी। उन्होंने इंदिरा तक पहुंचने के लिए राजीव गांधी की मदद लेने का फैसला किया।

राजीव की कोशिश से वे अंतत: इंदिरा गाँधी से एक घंटे का समय लेने में सफल हो गए। नवंबर की उस शाम इंदिरा गाँधी ने अपने पूरे कैबिनेट को बुला रखा था, लेकिन उस बैठक में संचार मंत्री सीएम स्टीफन जिनके महकमे के बारे में सैम पित्रोदा बात करने वाले थे, मौजूद नहीं थे।

इंदिरा गांधी भी बैठक में समय से नहीं पहुंच पाईं। सबसे पहले राजीव गाँधी आए, उसके बाद अरुण नेहरू और अरुण सिंह। सैम याद करते हैं, "जैसे ही मेरी नजर राजीव गांधी पर पड़ी, मैंने उनकी आँखों में एक चिंगारी देखी और उसी क्षण से हमारे बीच एक संपर्क स्थापित हो गया। अगर हम में से कोई महिला होता तो ये पहली नजर में प्यार का सबसे बड़ा उदाहरण होता।"
विज्ञापन

दूरसंचार से बदलेगी भारत की तस्वीर

थोड़ी देर में इंदिरा गांधी पहुंच गईं। राजीव ने सैम को उनसे मिलवाया। वो बहुत गर्मजोशी से मुस्कराईं। सैम का प्रेजेन्टेशन शुरू हुआ। उन्होंने बताया किस तरह भारत में दूरसंचार की तस्वीर बदली जा सकती है। उन्होंने उन साठ मिनटों में टेलिफोन को एक साधारण उपकरण से उठा कर सामाजिक परिवर्तन के एक माध्यम के रूप में बदल दिया।

सैम कहते हैं, "उन्होंने मुझे इतने ध्यान से सुना कि कई बार मुझे लगा कि मैं सिर्फ उनकी तरफ ही देख रहा हूँ।" इंदिरा ने एक सवाल भी नहीं पूछा। सिर्फ राजीव और वित्त मंत्री आर वेंकटरमन ने सवाल पूछे। अंत में इंदिरा गांधी ने सैम से हाथ मिलाया और सिर्फ एक शब्द कहा, ‘गुड।’ इस एक शब्द ने भारत में संचार क्रांति की नींव रख दी थी।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें