जाट आरक्षण को कैबिनेट की बैठक में मंजूरी दिलाकर चौ. अजित सिंह ने जो पैंतरा चला है, वह विपक्षी पार्टियों पर ही नहीं बल्कि उनके विरोधी जाट नेताओं पर भी भारी पड़ा है।
लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दबाव की राजनीति कर अजित सिंह ने जो दांव चला है, उससे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रालोद नये चुनावी समीकरण लेकर सामने आया है।
जाट आरक्षण की मांग 1949 में पूर्व प्रधानमंत्री और चौ. अजित सिंह के पिता चौधरी चरण सिंह ने उठाई थी। इसके बाद चौ. अजित सिंह ने आरक्षण की मांग को ठंडा नहीं होने दिया। जिसके चलते प्रदेश स्तर पर तो जाटों को आरक्षण मिला। लेकिन केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण की मांग बनी रही।
मुजफ्फरनगर दंगों ने किया था रालोद का नुकसान
मुजफ्फरनगर दंगे में जाट और मुस्लिमों के बीच हुए संघर्ष में रालोद मुखिया चौ. अजित सिंह का जनाधार पूरी तरह खिसकता हुआ नजर आया। क्योंकि अब तक चुनाव में रालोद जाट और मुस्लिम गठजोड़ पर ही सियासी सफर फतह करता रहा था।
19 दिसंबर को कैबिनेट में जाट आरक्षण के प्रस्ताव पर मुहर लगाते हुए आयोग को भेज दिया गया। इसी का असर था कि 23 दिसंबर को मेरठ में जो संकल्प रैली हुई, वह रालोद के इतिहास में दर्ज हो गई।
जाट आरक्षण मिलता देख जाटों की नाराजगी काफूर होती दिखाई दी और रैली में रिकार्ड भीड़ जुटी।
मेरठ रैली के बाद अजीत ने कांग्रेस पर बनाया दबाव
इस रैली में आए लोगों के मिजाज को भांपते हुए चौ. अजित सिंह ने कांग्रेस पर जाट आरक्षण चुनाव से पहले लागू करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया था।
रविवार को कैबिनेट की विशेष बैठक में सिर्फ जाट आरक्षण पर चर्चा हुई। सूत्रों की मानें तो चौधरी अजित सिंह इस बैठक में आर या पार का मूड बनाकर गए थे।
उनका यह रूप दशकों बाद कार्यकर्ताओं को नजर आया। शायद यही कारण रहा कि चौ. अजित सिंह के दबाव में बैठक में केंद्रीय सेवाओं में जाट आरक्षण को मंजूरी दे दी गई।
जाट आरक्षण के दांव ने बिगाड़ दिया BJP का गणित
जाट रालोद का परंपरागत वोटर रहा है। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगे के बाद इस नाराजगी को भुनाने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ी।
इस खिसकते वोट बैंक पर रालोद को भरोसा था कि जाटों को केंद्र में आरक्षण मिलने पर उनका वोट बैंक और अधिक मजबूत होगा।
इसके लिए रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह तीन माह से केंद्र सरकार पर दबाव बनाए हुए थे। जाट आरक्षण के असमंजस में भाजपा मुजफ्फरनगर दंगे पर सियासत कर जहां जाट लैंड में अपना सियासी पारा चढ़ाने पर लगी थी। उसे अब झटका लगा है।
हालांकि भाजपाई प्रदेश में जाट आरक्षण देने का श्रेय लेकर इस पर सफाई देने में जुटे हैं।
सपा के सियासी समीकरण भी हो जाएंगे गड़बड़
सपा भी पश्चिम में जाट वोटरों को लुभाने के लिए दिग्गजों को लाल बत्तियां देकर लुभाने का प्रयास कर चुकी है। इनमें अनुराधा चौधरी, साहिब सिंह, राजेंद्र चौधरी और राजपाल सिंह का नाम प्रमुख है।
लेकिन जाट आरक्षण में अंतिम मुहर लगने के बाद सभी के समीकरण धरे रह गए।
यूपी की 15 सीटों पर पड़ेगा आरक्षण का सीधा असर
जाट आरक्षण से पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 15 सीटों पर सीधा प्रभाव पड़ेगा। जाट बहुल इन सीटों पर अब विपक्षियों को नये पैंतरे और समीकरण जोड़ने होंगे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की मेरठ, बागपत, मुजफ्फरनगर, कैराना, बिजनौर, नगीना, अमरोहा, सहारनपुर, संभल, गाजियाबाद, बुलंदशहर, अलीगढ़, हाथरस, मथुरा, फतेहपुर सीकरी लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां पर जाट निर्णायक भूमिका में हैं।
जाट आरक्षण के बाद एक बार फिर रालोद इन सीटों पर जहां मजबूती से अपनी दावेदारी पेश करने के लिए तैयार होगी, वहीं विपक्षी दलों के सामने इससे पार पाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा।