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क्या सोनिया युग ख़त्म होने वाला है?

Wed, 07 May 2014 03:21 PM IST
ज़ुबैर अहमद/बीबीसी संवाददाता
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अगर किसी को भारत के मीडिया में की जा रही चुनावी भविष्यवाणियों पर यकीन है तो उसे तो ये ही लग रहा होगा कि कांग्रेस पार्टी के दस साल के शासनकाल पर जल्द ही पर्दा गिर सकता है।
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भविष्यवाणियां ये भी की जा रही हैं कि नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली विपक्षी भाजपा सधे हुए इरादों के साथ दिल्ली में नई सरकार का गठन करने जा रही है। साल 2004 और 2009 में भी ऐसी ही चुनावी भविष्यवाणियां की गई थी और वे ग़लत साबित हुईं। इसलिए हर किसी को इस तरह की चुनाव पूर्व अटकलों से सावधान हो जाना चाहिए।

लेकिन अगर ये भविष्यवाणियाँ सच साबित हो गईं तो कांग्रेस की ताक़तवर नेता सोनिया गांधी के साथ क्या होगा? वे कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर 1998 से बनी हुई हैं। कांग्रेस पार्टी के कुछ बड़े नेताओं का मानना है कि पार्टी को बड़े बदलावों की बहुत ज़रूरत है। लेकिन सोनिया गांधी के भविष्य पर वे कुछ नहीं कहना चाहते।
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कोई नेता इस बात पर दांव नहीं लगाना चाहता कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की इतालवी मूल की विधवा सोनिया गांधी पार्टी के अध्यक्ष पद पर बनी रहेंगी या कांग्रेस की कमान अपने 43 साल के बेटे राहुल गांधी को सौंप देंगी। पार्टी में फ़िलहाल राहुल का ओहदा सोनिया के बाद नंबर दो का है।

राजीव की हत्या के बाद की राजनीति

सोनिया गांधी पहले ही 126 साल पुरानी इस पार्टी की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहने वाली नेता की पहचान पा चुकी हैं। उनके विदेशी मूल के मद्देनज़र ये एक अहम उपलब्धि है। राजनीति में आने से पहले वे एक घरेलू महिला की सुकूनपरस्त ज़िंदगी जी रही थीं। 1984 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें राजनीति को क़रीब से देखने का मौका मिला।

साल 1991 में जब तमिल विद्रोहियों ने उनके पति की निर्दयतापूर्वक हत्या कर दी थी तो उनकी दुनिया बिखर सी गई। उनकी मौत के साथ ये महसूस किया जाने लगा कि पार्टी और देश पर नेहरू गांधी परिवार की पकड़ हमेशा के लिए ख़त्म हो गई।

यहाँ तक कि 1991 के चुनावों के बाद पार्टी जब सत्ता में आई तो 1966 में इंदिरा गांधी के सत्ता में आने के बाद से नरसिम्हा राव कांग्रेस के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बने जो कि नेहरू गांधी परिवार के सदस्य नहीं थे।

राव के सत्ता से हटने के बाद जब सीताराम केसरी को कांग्रेस की कमान सौंपी गई तब ये सवाल उठा कि क्या इस पद पर ज्यादातर परिवार का ही कोई व्यक्ति होना चाहिए?

गौरवपूर्ण अतीत की एक ख़राब छाया

राव के वक्त पार्टी ने पाँच साल तक शासन किया और उसके बाद चुनावों में हार मिली। कई अच्छे नेताओं ने हताश होकर पार्टी छोड़ दी। कांग्रेस पार्टी अपने गौरवपूर्ण अतीत की एक ख़राब छाया की तरह दिखने लगी। सोनिया गांधी स्वेच्छा से चुनी गई अलगाव की स्थिति में बनी रही।

आख़िरकार उनके पास ज़िम्मेदारी उठाने की मुखर होती मांगों के सामने घुटने टेकने के अलावा और कोई चारा न रहा। भारत की राजनीति की बारीकियों को वे समझ ही रही थीं कि कांग्रेस पार्टी को दो आम चुनावों में हार का स्वाद चखना पड़ा लेकिन उन्हें इस बात का पूरा श्रेय जाता है कि वे पार्टी को फिर से खड़ा कर पाने में कामयाब रहीं और शुरुआत में उन्होंने प्रतिभाओं को प्रोत्साहन भी दिया।

सोनिया गांधी की बड़ी कामयाबियों में 2004 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को मिली जीत की अगुवाई करना था। सभी चुनावी भविष्यवाणियां ग़लत साबित हुईं। जीत के बाद पार्टी नेताओं का उन पर तगड़ा दबाव था कि वे प्रधानमंत्री बनें। पार्टी के बाहर के कई लोगों ने उनके इतालवी मूल के होने का सवाल उठाया, जिसे बीजेपी और अन्य हिंदू संगठनों ने भी खूब हवा दी।

फिर, एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर

प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह के नाम पर उनकी मुहर एक सोचा समझा फैसला था। सोनिया किसी ताक़तवर नेता को नहीं चाहती थीं जो कि उनकी हैसियत को चुनौती दे सकता था। सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह की जुगलबंदी परवान चढ़ती रही। सोनिया की कामयाबी को ठीक उस तरह से देखा जा सकता है जैसे फ़ीनिक्स चिड़िया राख से उठ खड़ी होती है।

यही कहानी 2009 में भी दोहराई गई जब कई राजनीतिक पंडितों ने कहा कि पार्टी चुनाव हारने जा रही है पर कांग्रेस दोबारा चुनाव जीत गई। सोनिया गांधी ने एक बार फिर से प्रधानमंत्री पद के लिए मनमोहन सिंह का नाम आगे किया लेकिन इस बीच उन्होंने अपने बेटे को नेतृत्व के तौर पर उभरने का मौका दिया।

सोनिया गांधी ने न केवल पार्टी में जान फूंकी बल्कि उसे उसके पुराने गौरव को भी लौटाया और इसके साथ ही उन्होंने खु़द को भी भारत की सबसे ताक़तवर राजनेता के तौर पर स्थापित किया। यह कोई मामूली बात नहीं थी, उस महिला के लिए जो राजनीति के बियाबां में धकेले जाने से पहले एक घरेलू औरत थीं।

कई चीजों का श्रेय सोनिया गांधी को

उन्होंने इंदिरा गांधी के दौर से भी मुश्किल वक्त में पार्टी की कमान संभाली थी और कामयाबी पाई। सोनिया गांधी की उपलब्धियों का महत्व इस बात से भी बढ़ जाता है कि जब लोग ये मानते हैं कि नेहरू गांधी परिवार के बिना कांग्रेस पार्टी का कोई अस्तित्व नहीं है। उनका नेतृत्व उनके व्यक्तित्व के दो पहलुओं को दिखलाता है।

एक तरफ वे पार्टी के कामकाज पर पूरा नियंत्रण रखती हैं और उनके व्यक्तित्व का दूसरा पक्ष है ग़रीब लोगों के के लिए कुछ करने की चाह। पिछले पाँच सालों में जितने भी बड़े और महत्वपूर्ण विधेयक संसद से पास किए गए हैं, उनमें से ज्यादातर का श्रेय सोनिया गांधी को दिया जाता है। ग़रीबों के लिए खाद्य सुरक्षा जैसी बड़ी योजनाओं के लिए उन्हें ज़रूर ही श्रेय दिया जाना चाहिए।

इस सिलसिले में उन्होंने संसद में दिए एक जोशीले भाषण में विपक्ष से खाद्य सुरक्षा कानून को हक़ीक़त में बदलने का मौका न गंवाने की अपील की। उन्होंने कहा, "यूपीए सरकार की ओर से जो वादे किए गए थे और जो अधिकार दिए गए हैं, यह उन्हीं की श्रृंखला की एक कड़ी है। जैसे कि सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, काम का अधिकार और वन उत्पादों पर अधिकार।"

भ्रष्टाचार के मामलों से गई कांग्रेस की

उन्होंने आगे कहा, "खाद्य सुरक्षा कानून इस सिलसिले की पाँचवीं कड़ी है। इसे अधिकार देने वाला एक तरीका कहा जा सकता है। यह लोगों को क़ानूनी अधिकार देता है। सरकार पर अधिक ज़िम्मेदार और संवेदनशील होने के लिए दबाव डालता है और शिकायतों के निपटारे के लिए भरोसे के लायक एक सिस्टम भी मुहैया कराता है।"

सोनिया ने कहा, "इस तरीके से मुझे यकीन है कि देश का सशक्तिकरण होगा। इस पर हमें गर्व है कि ये हमने किया है।" सोनिया गांधी के सामाजिक सरोकारों का ज्यादातर ग़ैर सरकारी संगठनों ने स्वागत किया है। लेकिन बीते कुछ सालों में वित्तीय अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामलों की एक लंबी फ़ेहरिस्त ने सरकार और पार्टी की साख को बुरी तरह से नुक़सान पहुंचाया है।

पार्टी बदलते वक़्त के हिसाब से ख़ुद को बदल पाने में भी पीछे छूट गई। उसे साइबर दुनिया में पैदा हुई चुनौतियों से निपटना पड़ रहा है। दूसरी तरफ बीजेपी और नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया को गंभीरता से लिया और वो लाखों नौजवान वोटरों को अपनी ओर खींच रहे हैं।
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बेटा बनेगा 'राजा बेटा'

ऐसे हालात में जबकि अनेक पर्यवेक्षकों को कांग्रेस हार के कगार पर खड़ी प्रतीत होती है और जैसा कि मी़डिया और चुनावी पंडितों ने भी भविष्यवाणी कर रखी है अनिश्चित भविष्य की चिंता से केवल कांग्रेस को ही नहीं जूझना पड़ेगा बल्कि सोनिया गांधी के राजनीतिक भविष्य पर भी सवालिया निशान लग जाएगा। लेकिन वे एक इतालवी माँ है। और उन्होंने इतालवी परंपरा के मुताबिक़ ही ये सुनिश्चित किया है कि उनका बेटा 'राजा बेटा' बना रहे।

चुनावों में चाहे हार हो या न हो, मालूम पड़ता है कि उन्होंने तय कर लिया है पार्टी की ज़िम्मेदारी राहुल गांधी के कंधों पर ही होगी। राहुल पहले से मां से बहुत ज्यादा राय मशविरा किए बग़ैर महत्वपूर्ण मामलों में फ़ैसले लेते रहे हैं।

वे भले ही अपनी भूमिका कम कर लें लेकिन उन पर बड़ी ज़िम्मेदारियां बनी रहेंगी। एक विदेशी बहू से गृहिणी और फिर भारत की सबसे ताक़तवर नेता और कांग्रेस पार्टी की सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष बनने का उनका सफ़र लंबे समय तक याद रहेगा। ये कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि एक चुनावी हार उनके राजनीतिक सफ़र की चमक फीकी नहीं कर सकती।
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