अगर बिहार चुनावों ने किसी को वाकई पुनर्जन्म दिया है तो वो हैं कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी। मतगणना के दिन जब बिहार का फैसला हो रहा था और महागठबंधन का हर नेता जीत की खुशी मना रहा था...उस दिन अगर किसी के सुर सबसे ज्यादा बुलंद थे तो वो राहुल गांधी ही थे।
वैसे तो राहुल गांधी अपनी विवादित छुट्टियों से लौटने के बाद से ही ज्यादा मुखर नजर आ रहे थे और 'सूट बूट की सरकार' जैसा जुमला उछालकर भाजपा को सफाई देने पर मजबूर कर चुके हैं।
लेकिन अपनी दादी इंदिरा गांधी की जयंती पर मोदी और संघ पर राहुल गांधी ने जिस तरह से ताबड़तोड़ वार किए हैं उसके बाद राजनीतिक टीकाकार अनुमान लगा रहे हैं कि क्या अब वो अपने आपको नरेंद्र मोदी से सीधे मुकाबले में खड़ा कर रहे हैं?
अगर अनुमान सही है तो इसका मतलब ये है कि कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में उनकी ताजपोशी के दिन नजदीक आ रहे हैं। इस समय वे पार्टी में उपाध्यक्ष के पद पर हैं।
कांग्रेस के दिग्गज भी समझ रहे 'पीढ़ी परिवर्तन' का मौका
राहुल गांधी ने हाल ही में अपने ऊपर लगे ब्रिटिश नागरिकता के आरोपों का जवाब बेहद मंझे हुए सियासी खिलाड़ी की तरह दिया और केंद्र की सरकार को चुनौती दी कि वो उनके खिलाफ लगे आरोपों की जांच कराकर उन्हें जेल में डाल दे।
इंदिरा गांधी की जयंती पर राहुल ने मोदी और संघ को सीधी चुनौती दी। राहुल का ये रूप 2014 के लोकसभा चुनाव में भी नहीं दिखा था। बिहार के चुनाव परिणाम के बाद कहीं ना कहीं राहुल यह भांप गए हैं कि सरकार को लेकर जनता में अच्छे संकेत नहीं है और यही मौका है खुद को मोदी के सामने खड़े करने का।
कहीं ना कहीं कांग्रेस को भी लगने लगा है कि यही मौका है अपने युवराज को आगे करने का और अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने का। बिहार के नवनियुक्त मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शपण ग्रहण समारोह में पहुंचकर राहुल ने जिस तरह अपने कार्यकर्ताओं को हौंसला बढ़ाया उससे साफ है कि अब जो भी चुनाव लड़ा जाएगा, उसके असली सेनापति राहुल ही होंगे।
कांग्रेस के दिग्गज रणनीतिकार भी समझ रहे हैं कि पार्टी में 'पीढ़ी परिवर्तन' का यही बेहतरीन मौका है और मोदी सरकार की नीतियों को लेकर चल रही सुगबुगाहटों के बीच अपने सेनापति को आगे करनी ही समझदारी है।
कांग्रेस को फिर से खड़ा करना असली चुनौती
महागठबंधन की ऐतिहासिक जीत से पहले जहां यह चर्चा आम थी कि इस गठबंधन को बनवाने में कांग्रेस का बड़ा हाथ है, वहीं जीत के बाद गठबंधन की मौजूदा और कारगर राजनीति में अब कांग्रेस की इज्जत और बढ़ गई है।
बिहार में ग्रामीण इलाकों में बुरी तरह पिछड़ी भाजपा की हार के बाद कांग्रेस यह सोचकर भी खुश है कि मौजूदा सरकार आम आदमी तक नहीं पहुंच पा रही है। सियासी पंडित यह मान रहे हैं कि बिहार में कांग्रेस के 27 विधायकों की जीत के बाद राहुल के हमलों में धार आई है।
इन 27 विधायकों की जीत के बलबूते राहुल सबसे पहले 2014 के बाद धराशाई हुए अपने कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने में जुट गए हैं, जिसकी झलक इंदिरा गांधी जयंती के कार्यक्रम में मंच से दिखाई दी।
मोदी और संघ पर सीधा हमला इस बात का भी संकेत है कि संसद में सरकार की नीतियों पर अब राहुल सीधी टक्कर लेंगे। अभी तक कुछेक मुद्दों पर ही संसद में दिखाई देने वाले राहुल के लिए अब किसी भी मुद्दे को छोड़ना उनसे ज्यादा उनका पार्टी के लिए खतरनाक होगा।
कितना चढ़ेगा राहुल को ये रंग?
राहुल ने इंदिरा गांधी की जयंती के मंच से हर वो बात की, जिसमें उनकी भविष्य की रणनीति की झलक थी। राहुल ने अपनी पार्टी के युवाओं से पहली पंक्ति में खड़े होने की अपील की तो इशारों-इशारों में वरिष्ठ नेताओं को ना भूलने की भी हिदायत दे दी।
राहुल के इन तेवरों पर विरोधी पार्टी के नेता भी हैरान हैं और अपनी पार्टी में उपेक्षा झेल रहे बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा ने राहुल को राजनीति का उभरता सितारा बताकर इस हैरानी को परेशानी में बदलने की कोशिश भी की है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि एक अकेले बिहार चुनाव ने राहुल को सियासी संग्राम के मुख्य मोर्चे पर पहुंचा दिया है। बिहार चुनाव के हीरो और रणनीतिकार प्रशांत किशोर को अपने खेमे में शामिल करने की कोशिश में लगे राहुल ने एहसास करा दिया है कि यूपी में भाजपा सहित अन्य दलों के लिए मुकाबला अब आसान नहीं है। देखना दिलचस्प होगा कि राहुल का ये सियासी रंग कितना गहरा चढ़ता है।