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जानिए चार महीनों में कितना बदले राहुल गांधी और क्यों?

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लगभग 75 दिनों में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का दो अलग-अलग टीवी चैनलों को साक्षात्कार देना यह बताता है कि भले ही जल्द हो या धीरे लेकिन शायद वो सीख रहे हैं और एक आत्मविश्वास से भरे नेता के तौर पर उभर रहे हैं।
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इस साल जनवरी के आखिर में समाचार चैनल 'टाइम्स नाओ' के अर्णब गोस्वामी को दिए साक्षात्कार में जहाँ राहुल अनिश्चित, झिझके हुए, मितभाषी और शब्दों को दोहराते हुए नज़र आए थे, वहीं शनिवार रात टीवी टुडे के जावेद अंसारी से बात करते हुए राहुल गांधी पहले से अधिक सहज, तैयारी के साथ नज़र आए।

पिछले इंटरव्यू में अटक रहे थे राहुल गांधी

इसमें कोई शक नहीं है कि आलोचक यह कह सकते हैं कि यह अंतर अर्णब गोस्वामी की जगह जावेद अंसारी के होने की वजह से हो सकता है, क्योंकि अर्णब के साक्षात्कार लेने को लेकर कथित डर की अपनी अलग कहानी है।

इस साल जनवरी के मध्य में तालकटोरा स्टेडियम में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के अधिवेशन से लेकर व्यस्त चुनाव प्रचार के कार्यक्रम के दौरान पिछले चार महीनों में राहुल गांधी अधिक परिपक्व होते दिखे हैं।

जनवरी के टाइम्स नाओ वाले साक्षात्कार में राहुल गांधी 1984 के सिख विरोधी दंगों के साथ ही कई और सवालों का जवाब देने में अटक रहे थे।

नहीं खोया राहुल ने आपा

जावेद अंसारी द्वारा साक्षात्कार लिया जाना उनके लिए राहत भरा हो सकता है और इस बारे में सच्चाई अगला साक्षात्कार सामने आने पर ही पता चलेगी लेकिन कल रात उन्होंने अपने शब्दों के चयन और शारीरिक संकेतों की भाषा से भरोसेमंद संकेत दिए हैं।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर बात करते हुए आक्रामक होते हुए भी राहुल ने अपनी भाषा पर संयम रखा और अपना आपा नहीं खोया।

संतुलित हो रहे हैं राहुल

हो सकता है कि पिछले कई महीनों के दौरान कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए की सरकार के कार्यकाल खिलाफ उठ रही जनभावनाओं से जूझते हुए उन्होंने आक्रामक होते हुए भी अपनी शैली और शब्दों के चयन में संतुलित रहना सीख लिया है।

राहुल गांधी ने देश की विविधता को देखा है और साथ ही नेहरू-गांधी परिवार पर और उनकी पार्टी हुए व्यक्तिगत हमलों को भी झेला है। इससे उन्हें एक अधिक मंझा हुआ नेता बनने में मदद मिली है।

करने पड़ते हैं समझौते भी

उनके सिद्धांतों की जगह अब राजनीतिक ज़िंदगी की वास्तविकताएं ले रही हैं जिसमें कुछ समझौते भी करने पड़ते हैं। यह तब दिखा जब उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार इमरान मसूद की कड़ी आलोचना होने के बावजूद सहारनपुर जाने का फैसला किया।

इमरान मसूद ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ काफी आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया था। इससे पहले राहुल शायद उस व्यक्ति की निंदा करते हुए उस इलाके में न जाते लेकिन इस बार राहुल ने वहां जाकर रैली की।

क्या ये महज इत्तेफाक था?

हालांकि शनिवार रात टेलीविजन के प्राइम टाइम पर भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी का एक साथ हिंदी के दो अलग-अलग समाचार चैनलों पर आना लोगों के मन में कई सवालों को छोड़ गया होगा।

जैसे उन्होंने अपनी बात कहने के लिए किसी खास चैनल या पत्रकार का चुनाव ही क्यों किया या उनका एक ही समय पर आना महज इत्तफाक था?
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'उठाऊंगा पीएम पद की जिम्मेदारी'

नरेंद्र मोदी अपने आक्रामक तेवर के लिए जाने जाते हैं, लेकिन राहुल में एक आक्रामक धार की कमी बताई जाती रही है। जनवरी में जिस अहम सवाल का स्पष्ट जवाब उन्होंने नहीं दिया, शनिवार रात के इंटरव्यू में वो ये बोलने में बिल्कुल नहीं हिचके कि अगर सांसद उन्हें चुनते हैं तो वो प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी उठाएंगे।

ये स्पष्टता इस चार महीनों में एक खास बढ़त जरूर दिखाती है।

हालांकि एक इंटरव्यू के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि राहुल गांधी आने वाले समय में इसी आत्मविश्वास का परिचय देते रहेंगे या नहीं और इसी से पता चलेगा कि उनका पिछला इंटरव्यू सुनियोजित योजना का हिस्सा था या नहीं।
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