हरियाणा के हिसार जिले में बरवाला के सतलोक आश्रम के बाहर पुलिस और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल तैनात हैं और दूसरी तरफ संत रामपाल की राष्ट्रीय समाज सेवा समिति के कार्यकर्ता हैं। अभी तक पुलिस प्रशासन अदालत के निर्देशों का पालन करने में असमर्थ रहा है।
यह घटना पंजाब-हरियाणा में एक बडे़ रुझान की ओर इशारा करती है। ये रुझान है धर्म गुरुओं का अपनी सत्ता चलाने की कोशिश करना और लोकतांत्रिक संस्थाओं की अवमानना करना। इतना ही नहीं ये लोग अपनी निजी सेनाओं तक का गठन कर चुके हैं।
सतलोक आश्रम के पास राष्ट्रीय समाज सेवा समिति के नाम से निजी सेना है, उसी तरह सिरसा के डेरा सच्चा सौदा के पास 'शाह सतनाम जी ग्रीन 'एस' वेलफेयर फोर्स विंग' है। जब भी डेरा मुखिया बाबा राम रहीम की अदालत में पेशी होती है तो ये सेना सारे सिरसा शहर को सफाई, सुरक्षा और श्रद्धा के नाम पर कब्जे में कर लेती है।
अगर पेशी अम्बाला या चंडीगढ़ में होती है तो श्रद्धालू इतनी बडी तादाद में पहुंचते हैं कि अदालत में आना-जाना मुश्किल हो जाता है। आवाजाही के तमाम बंदोबस्त गड़बड़ा जाते हैं।
टकसाल के समर्थकों से टकराव
पंजाब में जालंधर जिले के नूरमहल कस्बे में दिव्या ज्योति जागृति संस्थान की अपनी निजी सेना है। इस संस्थान का कई बार सिख संस्थाओं के साथ टकराव भी हो चुका है।
अभी पिछले महीने इनका तरनतारन जिले में दमदमी टकसाल के समर्थकों के साथ टकराव हुआ था। दमदमी टकसाल सिख संस्था है जिनके पास हथियारबंद लोगों की अपनी सेना है।
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के मुखिया आशुतोष की मृत्य 29 जनवरी को हो गई थी पर संस्थान के प्रबंधक दावा करते हैं कि वे समाधि में हैं। इस दौरान दावेदारी और विरासत से जुडे़ मामले अदालत तक पहुंच गए हैं।
संस्थान की निजी सेना अंदरुनी लड़ाई में भी खतरे का सबब बन सकती है।
नामधारी परंपरा का डेरा लुधियाना के गांव भैणी साहिब में है जिसकी अपनी निजी सेना है। इस सम्प्रदाय के मुखिया सतगुरु जगजीत सिंह की मृत्यु के बाद विरासत को लेकर तकरार है और किसी बडे़ टकराव का कारण कभी भी बन सकता है।
नागरिकों की सुनवाई नहीं
इस तरह तकरीबन हर डेरा और आश्रम के पास अपनी निजी सेना है। यह सेनाएं अपने-अपने सत्संगों और प्रवचनों के मौकों पर सड़कों का बंदोबस्त अपने हाथ में ले लेती हैं। राधा स्वामी डेरा के कार्यकर्ता हर रविवार को सड़कों पर तैनात रहते हैं।
इससे आम लोगों के लिए तमाम तरह की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। दरअसल डेरे और आश्रम एक तरफ तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की परवाह नहीं करते और दूसरी तरफ नागरिकों की जिंदगी में दखलअंदाजी करते हैं, यहां नागरिकों की सुनवाई करने वाला कोई नहीं है।