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ऑनलाइन विश्वविद्यालयों का ठिकाना बनेगा भारत?

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ऑनलाइन विश्वविद्यालय चलाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों की निगाहें भारत पर टिकी हुई हैं। भारत में सिर्फ 12 फीसदी लोगों को विश्वविद्यालय में दाखिला मिल पाता है। दूसरी ओर, सरकार ने विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने वालों की तादाद साल 2030 तक बढ़ा कर 30 प्रतिशत करने का लक्ष्य तय कर रखा है।
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मौजूदा हालात और लक्ष्य के बीच की इस बड़ी खाई की वजह से भारत इन कंपनियों के लिए बहुत बड़ा बाजार है। अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित कोर्सेरा इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी है। इस समय यह 140 विश्वविद्यालयों से मुफ्त पढ़ाई करवाती है और 1.70 करोड़ लोग इससे जुड़े हुए हैं। इसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी रिक लेविन का मानना है, "भारत सरकार ने बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर रखा है और साफगोई से कहा जाए तो इसे हासिल करना लगभग नामुमकिन है।"

उनका तर्क है कि इसके लिए करीब दो हजार नए विश्वविद्यालय खोलने होंगे और मौजूदा संस्थानों का काफी विस्तार करना होगा। येल विश्वविद्यालय के इस पूर्व अध्यक्ष का मानना है कि इस खाई को पाटने का काम ऑनलाइन विश्वविद्यालय ही कर सकते हैं। डॉक्टर लेविन के मुताबिक, भारत के सबसे अधिक लोकप्रिय दस पाठ्यक्रम सूचना प्रौद्योगिकी या डाटा साइंस से जुड़े हैं।
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भारत में बढ़ रहा सॉफ्टवेयर उद्योग

भारत में जिस तेजी से सॉफ्टवेअर उद्योग बढ़ रहा है, यहां कुशल कर्मचारियों की मांग आने वाले समय में काफी बढ़ेगी। वे यह भी कहते हैं कि मौजूदा समय में भारत की उच्च शिक्षा सभ्रांत लोगों तक सीमित है और यहां गिने चुने संस्थान ही उच्च स्तर के हैं। वे कहते हैं, "यहां जबरदस्त आर्थिक संभावनाएं हैं और ढेर सारे प्रतिभाशाली युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक शिक्षा नहीं मिल पाती है।"

कोर्सेरा येल, स्टैनफोर्ड, कोलंबिया और एडिनबरा विश्वविद्यालयों की पढ़ाई मुफ्त कराती है। पर उनकी बाहरी परीक्षा नहीं होती और उनकी डिग्रियां मान्यता प्राप्त नहीं होतीं। मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्स (एसओओसी) के तहत काम करने वाली कंपनियो की अगली कोशिश यह होगी कि वे पूर्ण डिग्री वाली पढ़ाई मुहैया कराएं। भारत में इस क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती नौकरी देने वाली कंपनियों की ओर से है।

मसला यह है कि वे एमओओसी से हासिल की गई डिग्रियों को स्वीकार करें और उसके आधार पर लोगों को नौकरी दें। यही सबसे बड़ी मान्यता भी होगी। लेविन इसके साथ ही यह भी कहते हैं कि इसका मतलब यह भी नहीं कि पांच सौ साल से काम कर रहे संस्थान अपना बोरिया बिस्तर समेट लेंगे। वे कहते हैं, "दरअसल, हम सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। हम खाई को पाटने में लगे हुए हैं, हम लोगों को पढ़ने के मौके दे रहे हैं।"
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अमेरिका में ज्यादातर पढ़ते हैं भारतीय

भारत के ज्यादा से ज्यादा छात्र अमेरिका के पारंपरिक विश्वविद्यालयों में दाखिला ले रहे हैं। बीते साल ऐसे छात्रों की तादाद में 30 फीसदी का इजाफा हुआ। अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों में चीन के बाद भारत के ही लोग हैं। दूसरी ओर ब्रिटेन में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या में लगातार चौथे साल गिरावट दर्ज की गई है। वहां साल 2010-11 की तुलना में आधे भारतीय छात्र इस समय पढ़ रहे हैं। लेकिन ब्रिटेन की ओपन यूनिवर्सिटी ने भारत को लेकर काफी महत्वाकांक्षी योजनाएं बन रखी हैं।

उसकी योजना भारत में सीधे कोर्स शुरू करने की नहीं है। वे स्थानीय साझेदारों के साथ मिल कर काम करेंगे और यहां पहले से चल रही मान्यता प्राप्त डिग्रियों की पढ़ाई मुहैया करवाएंगे। ओपन यूनिवर्सिटी के एक्सटर्नल इनगेजमेंट डाइरेक्टर स्टीव हिल ने बीबीसी से बताया, "वे अपनी स्थानीय क्वालीफिकेशन देंगे। पर सामग्री ऑनलाइन होगी और ओपन यूनिवर्सिटी की होंगी।" वे इसके आगे जोड़ते हैं, "विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए यह कहना गलत होगा कि हम आपकी समस्याएं सुलझाने के लिए यहां आए हैं। हम यहां परिसर खोलेंगे और आपको अपनी डिग्रियां देंगे।"

हिल के मुताबिक, स्थानीय साझेदारों के साथ मिल कर चीन में दो लाख छात्रों को पढ़ाई मुहैया कराई गई है। उन्हें भारत में भी ऐसा ही कुछ करने की उम्मीद है। हिल यह भी मानते हैं कि अगले 15 साल में 1 करोड़ 40 लाख छात्रों को पढ़ाई की सुविधा मुहैया कराने के लिए ऑनलाइन पढ़ाई सबसे मुफीद है। इस समय भारत में डिस्टैंस लर्निंग यानी घर बैठे पढ़ाई करने वालों की तादाद 35 लाख है। ब्रिटिश कौंसिल ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि साल 2025 तक पढ़ाई करने वाली उम्र के सबसे ज्यादा लोग भारत में ही होंगे।
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