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फेसबुक पर सेंसर लगाने में भारत अव्वल

Sun, 15 Nov 2015 10:46 PM IST
देवनिक साहा
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भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भले ही ब्रिटेन में डिजिटल इंडिया को बढ़ावा दे रहे हों लेकिन फेसबुक द्वारा जारी एक सेंसरशिप रिपोर्ट कई सवालिया निशान खड़े करती है।
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फेसबुक पर पोस्ट की गई सामग्रियों में से 15,155 सामग्रियों पर भारत ने फेसबुक से कहकर प्रतिबंध लगवाया। वहीं दूसरे स्थान पर तुर्की रहा जिसने केवल 4,496 सामग्रियों के खिलाफ ऐसा किया।

फेसबुक पर मौजूद लोगों के अकाउंट के बारे में जानकारी हासिल करने में अमरीका सबसे आगे रहा तो भारत दूसरे स्थान पर।अमरीका ने फेसबुक से 26,579 लोगों की जानकारी मांगी वहीं भारत ने 6,268 लोगों की जानकारी हासिल की। ब्रिटेन तीसरे स्थान पर रहा, उसने 4,489 लोगों की जानकारी फेसबुक से ली।
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फेसबुक की इस रिपोर्ट से तीन बड़े सवाल खड़े होते हैं। जिस तरह से फेसबुक पर मौजूद सामग्रियों पर प्रतिबंध लगवाया जा रहा है वो कहीं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लगाम कसना तो नहीं है? कहीं सरकार इसका प्रयोग अपने राजनीतिक विरोधियों को रोकने के लिए तो नहीं कर रही?

सामग्रियों पर प्रतिबंध के लिए सरकार ने किया आग्रह

क्या फेसबुक अपनी इंटरनेट सेवा को भारत में लॉन्च करने के लिए यहां की सरकार की कुछ ज्यादा ही मदद तो नहीं कर रहा?

फेसबुक के अनुसार, उनकी वेबसाइट पर मौजूद सामग्रियों पर प्रतिबंध लगवाने के लिए भारत की कानून प्रवर्तन एजेंसियों और कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम की तरफ से आवेदन किए गए थे।

उनके अनुसार, ये सभी सामग्रियां धर्म विरोधी और भड़काऊ भाषण की श्रेणी में आती थीं। मीडियानामा के संस्थापक निखिल पाहवा कहते हैं, "दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि जिस तरह की सामग्रियों पर प्रतिबंध लगाया गया है उसका कोई डेटा मौजूद नहीं है।"

निखिल के अनुसार, "ऐसे में हम यह अनुमान नहीं लगा सकते कि किस तरह की चीजों पर प्रतिबंध लगाया गया है।" इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इनमें से कई सामग्रियां आपराधिक मामलों से भी जुड़ी थीं। ऐसे में भारतीय एजेंसियों ने फेसबुक से बहुत ही मूलभूत जानकारियां मांगी जैसे कि सब्सक्राइबर जानकारी, आईपी एड्रेस, अकाउंट कंटेंट या लोग क्या पोस्ट कर रहे हैं।

हालांकि यह भी कहा गया है कि फेसबुक इस तरह का कोई भी फैसला लेने से पहले यह सुनिश्चित करता है कि क्या वह सामग्री स्थानीय कानून का उल्लंघन कर भी रही है या नहीं। अगर ऐसा पाया जाता है तो उस पर उस देश में प्रतिबंध लगा दिया जाता है।

'हमें भी हो बैन हुई सामग्रियों की जानकारी'

निखिल कहते हैं, "एक नागरिक के तौर पर हमें यह जानकारी होनी चाहिए कि किस हद तक सामग्रियों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। हम सभी को यह अधिकार है, केवल सरकार को नहीं।"

वो कहते हैं, "यह फेसबुक की भी जिम्मेदारी बनती है कि वो ऐसी सामग्रियों और आवेदन के बारे में जानकारी साझा करे।" इतनी बड़ी संख्या में आवेदन करना सरकारी मशीनरी द्वारा लोगों की असहमति को दबाने का जरिया बन सकता है।

यह वैसा ही होगा जैसे धारा 66ए का बड़ी तादात में गलत इस्तेमाल कर राज्य सरकारें किसी को भी गिरफ्तार कर लेती थीं। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट को बीच में दखल देकर इस धारा को खत्म करना पड़ा।

सरकार भले ही दावे कर रही हो कि वो यह प्रतिबंध धर्म विरोधी और भड़काऊ भाषणों को रोकने के लिए लगवा रही है लेकिन दुर्भाग्यवश जमीनी तौर पर उसकी कथनी और करनी में बहुत ही फर्क नजर आ रहा है।

जैसा कि हमें इस साल की शुरुआत में देखने को मिला, उत्तर प्रदेश में एक छात्र ने समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के बारे में कुछ आपत्तिजनक पोस्ट किया। जिसके बाद खान ने उसके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई और छात्र को 15 दिन के लिए जेल हो गई।
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'प्रतिबंधित सामग्रियों पर पारदर्शिता हो'

हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव में भी हमने देखा कि भाजपा नेताओं की तरफ से कई आपत्तिजनक टिप्पणियां की गईं थीं।

दादरी मामले में भी संस्कृति मंत्री महेश शर्मा और भाजपा विधायक संगीत सोम की तरफ से कई मूर्खतापूर्ण टिप्पणियां की गईं जिसका चौतरफा विरोध हुआ लेकिन उनके खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की गई।

ऐसे में इस आशंका को नहीं नकारा जा सकता कि सरकार केवल उनके खिलाफ ही कार्रवाई करेगी जो उनकी समीक्षा करेगा। इस पर पाहवा कहते हैं कि फेसबुक पर जिन सामग्रियों पर भी प्रतिबंध लगाया जाता है उसके बारे में और अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए। इससे लोगों में उन्हें समझने में और अधिक आसानी होगी।
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