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जानिए, भारत-चीन रिश्ते की 5 खास बातें

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पत्नी पेंग लियुआन के साथ जब बुधवार को अहमदाबाद पहुंचेंगे तो दोनों देश कई मुद्दों पर अपना रुख तय कर चुके होंगे।
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इन मुद्दों में वे बातें भी होंगी जो दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती हैं और वे चीजें भी होंगी जिनकी वजह से दोनों के संबंधों में खटास आती रहती है।

भारत-चीन रिश्ते की पांच खास बातें पढ़िए आगे की स्लाइड में।

सॉफ्ट डिप्लोमेसी

शी की पत्नी पेंग चीन में एक लोकप्रिय गायिका हैं और वह दोनों देशों के रिश्तों में कुछ योगदान कर सकती हैं।

उनके साथ चीन में बने मोबाइल फोन और दूसरे सामान होंगे जो वह अन्य देशों की यात्रा के दौरान पेश करती रहती हैं।

वह अहमदाबाद के गांधी आश्रम जा सकती हैं और अगर ऐसा हुआ तो पिछले उदाहरणों के उलट होगा।

अतीत में चीनी नेता दोनों देशों करें ऐतिहासिक संबंधों को दोहराने के लिए बौद्ध केंद्रों को चुनते रहे हैं।

भारत एक ग्राहक

चीन में मजदूरी की बढ़ती दर और जमीन की छलांग मारती कीमतों ने तकनीक पर कम निर्भर उद्योगों के लिए घाटे की स्थिति ला दी है।

चीन से कई कंपनियां बाहर निकलकर वियतनाम जाने की जुगत में हैं। लेकिन वियतनाम के साथ सीमा विवाद ने उनके लिए ऐसा करना बहुत मुश्किल कर दिया है।

कम कीमत और कुशल कारीगरों की वजह से भारत एक अच्छे अवसर की पेशकश करता है। भारत को बेहतर बुनियादी ढांचा और माली मदद की दरकार है। चीन इस फासले को भरना चाहता है।

भारत के साथ सीमा विवाद

चीन की छवि ऐसे देश की बन गई है जो अपने पड़ोसियों को साथ लेकर नहीं चल सकता है।

जापान, वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस और भारत के साथ उसका सीमा विवाद है। भारत के साथ किसी समझौते पर पहुँचने से चीन की छवि बेहतर होगी।

चीन की महत्वाकांक्षा हिंद महासागर से खुद को जोड़ने की है और भारत के साथ उसका सीमा विवाद इसके आड़े आ रहा है।

भारतः दलाई लामा का घर

चीन की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्याओं में से एक तिब्बतियों का आंदोलन है। उसे लगता है कि भारत में रहकर दलाई लामा उसके यहां अलगाववादी आंदोलन को हवा दे रहे हैं।

चीन इसे उसके आंतरिक मामलों में दखल के तौर पर देखता है। उसकी मंशा मौजूदा तिब्बती नेतृत्व की मृत्यु के बाद नए नेता की घोषणा करने की है।

लेकिन उसे डर है कि भारत में मौजूद तिब्बती समुदाय नए अवतार की घोषणा करके उसकी कोशिशों पर पानी फेर सकता है।
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भारत का नेतृत्व

जब नरेंद्र मोदी को अमरीका ने वीजा देने से इनकार कर दिया था और पश्चिमी देशों ने भी उनसे दूरी बना ली थी तब चीन ने मोदी का स्वागत किया था।

अगले तीन दिनों में मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात के दौरान इस बात से फर्क पड़ सकता है। लेकिन मोदी ने कई मौकों पर उन्होंने अपने विचार खुलकर रखे हैं।

चुनाव प्रचार के वक्त अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे पर उन्होंने चीन को विस्तारवादी नीतियां छोड़ने के लिए कहा था।

मोदी शपथ ग्रहण के वक्त तिब्बत के निर्वासित सरकार के नेताओं को न्यौता देकर और वाराणसी के विकास की चाबी जापान को देकर चीन को चौंका चुके हैं।
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