फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इन 10 के लिए उपचुनाव के मायने

विज्ञापन
विज्ञापन
नौ राज्यों में लोकसभा की तीन और विधानसभा की 33 सीटों पर हुए उपचुनाव के नतीजे केंद्र में सत्तासीन भाजपा के लिए निराशाजनक रहे।
विज्ञापन


भाजपा को इनमें से केवल 12 विधानसभा सीटों पर जीत मिली। इन चुनाव परिणामों को भाजपा की कम होती लोकप्रियता के रूप में देखा जा रहा है।

वहीं माना जा रहा है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लिए ये नतीजे संजीवनी के समान हैं, जो उनमें नया उत्साह भरेंगे।

भारत एक अजब-गजब देश है। एक साथ निहायत सरल और अति जटिल। प्याज की परतों की तरह, एक के अंदर एक। हर परत उतनी ही महत्वपूर्ण।

जब तक न छुओ, गनीमत है। छूने पर आंसू निकाल देता है। और अंत में कुछ खास हाथ नहीं लगता। उस पर तुर्रा यह कि हर आदमी खुद में परतदार और हर दूसरा शख्स तराजू लिए खड़ा। कब मौका लगे कि सामने वाले को तोल दें।

विधानसभा की तैंतीस सीटों के नतीजे आए तो जैसे तैंतीस करोड़ परतें खुलकर सामने आ गईं। कोई परत फतुही, किसी के आंसू असली। सबके लिए अलग अर्थ।

व्यक्तिपरक निहितार्थों की सूची

नतीजे अपना निहितार्थ आदमकद विवेक पर छोड़ देते हैं। यह उनकी अदा है। पूरी सूची लंबी होगी इसलिए व्यक्तिपरक निहितार्थों की एक छोटी सूची :

नरेंद्र मोदी: आम चुनाव के सवा सौ दिन बाद प्रधानमंत्री की तथाकथित 'हवा' के चेहरे पर हवाइयां उड़नी चाहिए थीं, जो नहीं हुआ। नतीजे बगुले के पंख पर पड़ी पानी की बूंद की तरह फिसल गए। उनका गुब्बारा न फूटा, न पिचका। वे साफ बच गए हैं और पार्टी में अकेले 'महारथी' होने का उनका रुतबा इससे और बढ़ सकता है।

इस सुराख में पैबंद नहीं लग सकता

अमित शाह: असल गुब्बारा यहां फूटा। उसी उत्तर प्रदेश ने उनकी कामयाबी में कील चुभाकर उसे पंक्चर कर दिया, जहां झंडे गाड़कर वह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष पद तक पहुंचे थे।

सूराख इतना बड़ा कि पैबंद भी नहीं लग सकता। शाह के लिए यह सीधे अर्श से फर्श वाला मुहावरा बन गया। अब वे नई 'प्रयोगशाला' और नई शब्दावली ढूंढ़ते दिखेंगे।

रफ्तार कम ‌हुई

भाजपा: इसके दो हिस्से हैं। एक मोदी को लेकर विकल्पहीन है। नतीजों से कुछ निराश, कुछ खिन्न यह हिस्सा 'हवा' के बचाव का रास्ता तलाश करता फिरेगा।

दूसरा हिस्सा संभवतः प्रसन्न कि अब पार्टी में दरकिनार किए जाने की रफ्तार कम होगी। उन्हें भी पूछा जाएगा, फिर से। वैसे यह खुशफहमी ज्यादा है क्योंकि इन छिटपुट नतीजों से मोदी कार्यशैली नहीं बदलने वाली।

आनंदी बेन पटेल

आनंदी पटेल: परिणामों की चोट उन्हें देर तक सालेगी। घाव भरने में वक्त लगेगा और हो सकता कि वह भरे ही नहीं।

गुजरात में मोदी ने बहुत भरोसे के साथ उन्हें अपनी जगह सौंपी थी, इसलिए नहीं कि सिपहसालार मैदाने जंग में घायल हो जाए।

अपना घाव दिखाता-छिपाता फिरे। भारतीय जनता पार्टी के अंदर नई संभावना तलाश करने वाले वहां अब बढ़ सकते हैं।

वसुंधरा राजे

वसुंधरा राजे : पार्टी के अंदर और देश के सामने सफाई पेश करने वालों की सूची में यह नाम अग्रणी होगा। चुनाव हार जाना एक बात है। पर बात सिर्फ पराजय की नहीं है।

धुर विरोधी कांग्रेस को अपने गढ़ में रास्ता बनाने का मौका देना उन्हें अखरेगा। उनकी उम्मीद यही होगी कि कच्चे रास्ते पर डामर पड़ने से पहले अपनी सुरक्षा के लिए पर्याप्त अवरोध खड़े कर लिए जाएं।

राहुल गांधी

राहुल गांधी: बेवजह मुस्कुराते रहने के बहुत दिन बाद विधानसभा उपचुनाव के नतीजे से उन्हें बावजह मुस्कराने का मौका मिला है। चौतरफा घिरी कांग्रेस पार्टी के लिए यह अपने आप में बड़ी बात है।

परेशानी यह है कि इस नतीजे को क्या समझा जाए। वापसी की शुरुआत मानें तो रास्ते में धोखे बहुत हैं। पार्टी के कार्यकर्ता थोड़ा-सा उत्साहित हो जाएं, इतना ही बहुत है।

मुलायम सिंह

मुलायम सिंह: ग़ुब्बारा फोड़ अभियान के अखाड़े में सबसे सफल पहलवान। ऐसी दुलत्ती और बाद में धोबीपछाड़ कि सामने वाला संभलने से पहले ही चारो खाने चित्त. राज्य में और कुछ नहीं बदला है।

इसलिए समझना पड़ेगा कि यह 2017 की बानगी नहीं है और अप्रैल-मई के लोकसभा चुनाव अपवाद नहीं थे। उत्तर प्रदेश में जमीन गरम है और पक रही है।

मायावती

मायावती: उत्तर प्रदेश की 'प्रयोगशाला' में कार्यरत एक अबूझ लेकिन कुशल वैज्ञानिक। तीन महीना पहले लड़कर पराजित हुईं 'बहनजी' इस बार बिना लड़े अपनी जीत पर मुस्करा सकती हैं।

इस तरह और इसलिए कि उनके वोट उन्हीं के पास हैं, भाजपा में नहीं गए हैं। बरकरार हैं, ताकि सनद रहे और वक्त जरुरत काम आए।

यह खुशी अगले चुनाव में मुलायम सिंह यादव से बड़ी हो सकती है।

ममता बनर्जी

ममता बनर्जी: पश्चिम बंगाल में उपचुनाव के परिणाम राज्यसत्ता को बेचैन कर देने वाले हैं। तृणमूल की जमीन पर भाजपा ने पहला पौधा रोप दिया तो खलबली स्वाभाविक है।

उनका वोट प्रतिशत मामूली-सा कम हुआ लेकिन भाजपा का जिस रफ्तार से बढ़ा, उनकी नींद उड़ा देने के लिए पर्याप्त है।

गोकि भारतीय जनता पार्टी से फौरन कोई बड़ा खतरा नहीं है लेकिन अपनी जमीन तो संभालनी ही पड़ेगी।
विज्ञापन

वामपंथी दल

वामपंथी दल: उपचुनाव के नतीजों से वामपंथी पार्टियां राहत की सांस ले सकती हैं। हालांकि उनके पांव के नीचे से जमीन बहुत खिसक गई है, कुछ कोने बचे हुए हैं। त्रिपुरा में उनकी जगह कायम है और यह उम्मीद भी कि केरल में इस दफा उनकी बारी है।

पश्चिम बंगाल का सपना हाल-फ़िलहाल सपना ही रहने वाला है। उनके लिए यह बड़ी बात होगी कि वे राज्य में तीसरे नंबर के खिलाड़ी न बन जाएं।

लोकसभा के तीन उपचुनाव इस विश्लेषण में शामिल नहीं हैं। वहां हर नतीजा पहले से पता था। जिसकी संभावना थी, वही जीता। लेकिन निहितार्थ-प्रिय देश उसमें भी कुछ न कुछ ढूंढ ही लेगा।

जहां तैंतीस करोड़ देवी-देवता हैं, तैंतीस करोड़ निहितार्थ क्यों नहीं हो सकते। होने को तो सवा अरब भी हो सकते हैं, जितनी देश की आबादी है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें