'जो देश का मूड है, वही दिल्ली का मूड है।'
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली विधानसभा चुनावों में चार रैलियां कीं। उन रैलियों में वह जब भी मंच पर खड़े होते तो ये कहना नहीं भूलते कि जो देश का मूड है, वही दिल्ली की मूड है। दिल्ली विधानसभा चुनाव इसी वर्ष सर्दियों में हुए थे, और लोकसभा चुनाव पिछले वर्ष गर्मियों में।
बीते वर्ष 16 मई को जैसे-जैसे ईवीएम के वोटों की गिनती हो रही थी, वैसे-वैसे ये तय होता जा रहा था मतदाताओं ने वोट नहीं दिए, बल्कि आंधी को आवेग दिया था, नतीजों के रूप में जिसने तूफान की शक्ल ले ली।
31 फीसदी वोट और 282 सीटें के साथ 30 वर्षों बाद कोई पार्टी स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में आई। लोकसभा चुनाव के जब नतीजे आए, मोदी लहर का दबाव उन्होंने भी महसूस किया, जिन्होंने लगातार नरेंद्र मोदी को खारिज किया था।
हालांकि गर्मियों की वह तपती लहर सर्दियों की शीतलहर नहीं बन पाई। दिल्ली विधानसभा चुनाव ने मोदी को उस दावे को सिरे से नकार दिया कि जो देश का मूड है, वह दिल्ली का मूड है। लोकसभा चुनावों में 31 फीसदी वोट पाने वाली पार्टी दिल्ली में महज तीन सीटों पर सिमट गई।
2013 में मोदी चुने गए थे प्रधानमंत्री उम्मीदवार
दिल्ली के नतीजों को मोदी लहर का अंत माना जाए या न माना जाए, ये बहस का विषय हो सकता है; हालांकि इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकसभा चुनावों से दिल्ली विधानसभा चुनावों तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वोटों बटोरने की क्षमता कम होती गई।
बीजेपी ने सितंबर, 2013 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया था। मोदी उससे पहले गुजरात में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीत चुके थे।
प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में मोदी की ताजपोशी आसान नहीं थी, वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व भाजपा का एक खेमा उनके खिलाफ था। मोदी अपनी गहरी सांगठनिक पकड़ और पार्टी में बहुत ही मजबूत हो चुकी गुजरात लॉबी के बल पर आडवाणी खेमे को चित करने में कामयाब रहे।
पार्टी के भीतर निर्विवाद नेता चुन लिए जाने के बाद भी गुजरात के बाहर नरेंद्र मोदी की सफलता को लेकर संशय करने वालों की संख्या कम नहीं थी। राजनीति के कई जानकारों ने कहा कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के विधानसभा चुनाव मोदी का पहला बड़ा इम्तहान होंगे।
चार राज्यों में पहली बार परखी गई नेतृत्व क्षमता
आडवाणी मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाए जाने का विरोध इस कारण से भी करते रहे कि गुजरात दंगों के बाद बनी उनकी छवि का नुकसान भाजपा को मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में हो सकता है।
उस समय मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार थी, राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की।
मध्य प्रदेश भाजपा शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में दो और छत्तीसगढ़ में रमन सिंह के नेतृत्व में तीन चुनाव जीत चुकी थी। 2013 के चुनावों में भी उन्हें ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया गया था। राजस्थान में वसुंधराराजे मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं और दिल्ली में हर्षवर्धन।
सभी राज्यों में बीजेपी ने नेतृत्व दिया था, फिर भी जानकारों का कहना था कि चुनाव दरअसल मोदी के नेतृत्व का इम्तहान हैं।
विस चुनावों में भाजपा को शानदार कामयाबी
विधानसभा चुनावों में भाजपा ने शानदार कामयाबी पाई।
मध्य प्रदेश में भाजपा 230 सीटों में से 165 सीटें जीतने में कामयाब रही, छत्तीसगढ़ में ये आंकड़ा 90 में से 49 सीटों का था। राजस्थान में भाजपा ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
विधानसभा चुनावों के नतीजे लोकसभा चुनाव का संकेत हो सकते थे, हालांकि भाजपा के अंदर का ही खेमा उसे नरेंद्र मोदी की कामयाबी के बजाय राज्यों के मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवारों की जीत अधिक मान रहा था।
जानकारों का कहना था कि 2013 की सर्दियों के वे चुनाव नरेंद्र मोदी के नेतृत्व लिटमस टेस्ट थे, जिनमें लगभग वह खरे रहे।
सत्ता विरोधी लहर पर भारी पड़ी थी मोदी लहर
2013 के विधानसभा चुनाव इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण थे कि छत्तीसगढ़ को छोड़ अन्य तीनों ही राज्यों में भाजपा की सीटें भी बढ़ीं और वोट प्रतिशत भी।
मध्य प्रदेश में भाजपा के पिछले चुनाव की तुलना में 22 सीटें ज्यादा मिली, राजस्थान में 84 और दिल्ली में 8 सीटें। छत्तीसगढ़ में बीजेपी की एक सीट कम हुई थी।
राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की हार का बड़ा कारण सत्ता विरोधी लहर था, लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा की दोबारा वापसी ने ये स्पष्ट कर दिया था कि बेहतर नेतृत्व देकर सत्ता विरोधी लहर से भी निपटा जा सकता है। मोदी उस सत्ता विरोधी लहर के खिलाफ कारगर रहे।
मोदी लहर का चुनाव था लोकसभा चुनाव
लोकसभा चुनाव मोदी लहर का चुनाव था। भाजपा ने उन चुनावों में ऐतिहासिक जीत दर्ज की। भाजपा ने सत्ता में आने के लिए 272 प्लस का लक्ष्य रखा था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा सीटें जीतने में कामयाब रही।
सीट और वोट प्रतिशत का जिक्र पहले ही किया जा चुका है, फिर भी वह जीत कितनी हिमालयी थी, आप इसे ऐसे भी समझ सकते है कि गुजरात, राजस्थान, गोवा और हिमाचल प्रदेश की सभी की सभी सीटों पर बीजेपी ने परचम लहराया। उत्तर प्रदेश के 80 सीटों में से 73 पर कब्जा जमा लिया, जिन 7 सीटों पर भाजपा हारी, वे मुलायम परिवार और सोनिया परिवार के खाते में गई थीं।
भाजपा की जीत का डंका पूर्वोत्तर में भी बजा। असम में पार्टी ने 14 में 7 और अरूणाचल की दो सीटों में से एक सीट जीती। दक्षिण में आंध्र प्रदेश में बीजेपी-टीडीपी गठबंधन के हिस्से 25 में 17 सीटें आईं, कर्नाटक में बीजेपी की 28 में से 17 सीटें आईं।
मोदी लहर का असर ये था कि कांग्रेस समेत अधिकांश स्थायी दल धराशायी हो गए, बंगाला में तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु में एआईडीएमके और ओडिशा में बीजू जनता दल ही ऐसी पार्टियां थीं, जो उस लहर में भी अपने गढ़ बचा सकीं।
मोदी और शाह की जोड़ी ने इतिहास लिख डाला
भाजपा ने अपनी जीत का सिलसिला लोकसभा चुनावों के बाद भी बरकरार रखा। मोदी के करिश्माई नेतृत्व और अमित शाह के सांगठनिक कौशल का गठजोड़ 2014 की दूसरी छमाही में हुए विधानसभा चुनावों में देखा गया।
लोकसभा चुनावों के बाद हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली विधानसभा चुनाव हुए। दिल्ली और जम्मू-कश्मीर को छोड़ शेष राज्यों में भाजपा ने या तो बहुमत पाया या सबसे बड़ी पार्टी बनकर सत्ता में पहुंची।
इन चुनावों का महत्वपूर्ण पहलू ये रहा कि भाजपा ने दिल्ली को छोड़ किसी भी राज्य में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार नहीं दिया।
पार्टी की ये रणनीति उसकी बनाई हुई परिपाटी से अलग थी। लोकसभा चुनावों से पहले तक भाजपा ने विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार देती रही थी। लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की घोषणा नहीं की थी, जिसे नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में खूब उछाला था।
महाराष्ट्र में मोदी लहर को लगा तगड़ा झटका
मोदी बूते लोकसभा में आई भाजपा ने विधानसभा चुनाव के लिए मोदी लहर पर भरोसा जताया।
अक्टूबर में महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव हुए थे। 1999 से महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर भाजपा ने उन चुनावों के जरिए वापसी की। 288 सीटों की विधानसभा में भाजपा ने 122 सीटें जीती थी, हालांकि ये आंकड़ा बहुमत से कम था।
महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना अर्से से गठबंधन के रूप में चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन सीटों पर सहमति न हो पाने के कारण भाजपा और शिवसेना ने ये चुनाव अलग-अलग लड़ा। मिशन 272 प्लस की तरह ही भाजपा ने विधानसभा चुनावों के लिए मिशन 144 प्लस का लक्ष्य रखा। भाजपा से अलग हुई शिवसेना ने भी यही लक्ष्य रखकर चुनाव लड़ा था। बहुमत दोनों दलों ने नहीं पाया, लेकिन शिवसेना ने भाजपा के मंसूबों पर पानी जरूर फेर दिया।
शिवसेना से ही गठबंधन कर भाजपा ने महाराष्ट्र में सरकार बनाई, लेकिन मिशन 144 प्लस की नकामयाबी मोदी लहर के लिए पहला बड़ा झटका थी।
झारखंड, कश्मीर तक कमजोर पड़ी मोदी लहर
भाजपा ने हरियाणा के लिए मिशन 45 प्लस का लक्ष्य रखा, जिसे पाने में वो कामयाब रही। पार्टी ने वहां 47 सीटें जीती। हरियाणा में भाजपा की जीत कई मायने में ऐतिहासिक थी। पार्टी ने पहली बार सूबे में बहुमत के साथ सरकार बनाई।
2009 में भाजपा ने वहां मात्र 4 सीटें जीतीं। भाजपा ने नंवबर-दिसंबर में झारखंड और जम्मू-कश्मीर में हुए चुनावों के लिए भी बहुमत का ही लक्ष्य रखा।
दोनों ही राज्यों में उसे अपने बूते बहुमत नहीं पाया। झारखंड में पार्टी 37 सीटें ही जीत पाई। सहयोगी दलों के बल पर सत्ता में आने में कामयाब रही। जम्मू-कश्मीर में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनीं और 25 सीटें जीतीं।
लोकसभा चुनावों की तुलना में इन राज्यों में भाजपा का प्रदर्शन कमतर रहा, ये धारणा बनने लगी थी की मोदी लहर कमजोर पड़ रही है। इस वर्ष दिल्ली में हुए विधानसभा चुनावों ने इस धारणा पर मोहर भी लगा दी।
मोदी लहर में अब कितना दम बचा है, ये काफी हद तक बिहार के विधानसभा चुनावों में तय हो जाएगा।