इस समय पूरी दुनिया में लोग आइस बकेट चैलेंज पर चर्चा कर रहे हैं। इसके तहत आपको अपने ऊपर बर्फ़ीले पानी से भरी एक बाल्टी अपने ऊपर उलटनी होती है और इसका एक वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर अपलोड कर देना होता है।
ये वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रहे हैं। लोकप्रिय तो वह वीडियो भी हैं जिसमें चैलेंज हास्यास्पद मोड़ पर ख़त्म हुआ।
दुनिया की कई बड़ी हस्तियां ये चुनौती स्वीकार कर रही हैं।
जो चुनौती स्वीकार करता है वह किसी दूसरे को यह चुनौती देता है। जिसे चुनौती दी जाती है वह या तो अपने ऊपर बर्फीले पानी से भरी बाल्टी उलटता है या फिर 100 डॉलर का दान देता है। वह चाहे तो दोनों कार्य कर सकता है।
यह दान देना होता है एएलएस एसोसिएशन को। 25 अगस्त तक इस अभियान से सात करोड़ डॉलर (यानी लगभग 420 करोड़ रुपए) एकत्रित हो चुके हैं। जबकि फाउंडेशन को पिछले बरस 25 लाख डॉलर ही दान में मिले थे।
(फोटो साभार: डेली मेल)
तो यह एएलएस एसोसिएशन है क्या?
एएलएस एसोसिएशन को समझने से पहले हमें एएलएस को समझना चाहिए। एमियोट्रॉपिक लैटरल सेलेरोसिस जिसे आमतौर पर लाऊ गेहरिग्स डिज़ीज़ के नाम से जाना जाता है।
यह तंत्रिका तंत्र में होने वाली एक बीमारी है जिसमें मस्तिष्क और रीढ़ की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं। इसके बाद धीरे-धीरे यह कमजोरी शरीर के शेष हिस्से में फैल जाती है। इससे पैरालिसिस हो सकता है और मौत भी हो सकती है।
एएलएस एसोसिएशन एक अमेरिकी संस्था है जो इसी बीमारी के प्रति जागरूकता जगाने के लिए काम करती है।
हालांकि ये स्पष्ट नहीं है कि ये चैलेंज कैसे शुरु हुआ। लेकिन 2014 के मध्य से इसके वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होना शुरु हुए। इस समय दुनिया भर में इसकी चर्चा हो रही है।
चर्चा तो ठीक है लेकिन क्या एएलएस इतनी बड़ी समस्या है कि इतनी हाय तौबा मची हुई है?
एएलएस दुर्लभ किस्म की बीमारी है
दरअसल एएलएस है तो खतरनाक बीमारी लेकिन ये डॉक्टर भी कह रहे हैं कि ये दुर्लभ किस्म की बीमारी है। अमेरिका की ही बात करें तो हर साल पांच हजार छह सौ लोगों को यह बीमारी होती है।
आपको लगेगा कि यह संख्या बड़ी है तो इसी देश में वर्ष 2011 में दिल का दौरा पड़ने से पांच लाख 96 हजार 577 लोगों की मौत हुई जबकि कैंसर से पांच लाख 76 हजार से ज्यादा मारे गए। और तो और अल्जाइमर्स ने भी 84 हजार 974 लोगों को अपना शिकार बनाया।
तो फिर इस दुर्लभ बीमारी को लेकर इतनी हाय तौबा क्यों? कनाडा के एक पूर्व राजनयिक स्कॉट गिलमोर ने अपने ब्लॉग में लिखा है, "यह एक चतुराई से भरा मार्केटिंग का तरीका है। इसने आपको मूल तीन सवाल भी पूछने का मौका नहीं दिया। पहला ये कि इस दान की जरूरत किसे ज्यादा है? दूसरा इसका असर कितना होगा? और तीसरा ये कि क्या अभी ऐसी आपात स्थिति है?" उनका कहना है कि दरअसल दान की जरूरत दूसरी बीमारियों पर काम कर रहे लोगों को अधिक है।
ऐसा नहीं है कि कनाडा में इसकी निंदा हो रही है लेकिन अमरीका में नहीं। बॉस्टन ग्लोब में जॉन कीन ने जो कुछ लिखा है, उसका शीर्षक ही है, "आइस बकेट चैलेंज एक तिकड़म है अच्छा है कि यह दोबारा न हो।"
क्या आपने कभी सुना है कि किसी अमेरिकी संस्था ने पीने के पानी के लिए ऐसी कोई मुहिम चलाई हो?
एएलएस बड़ी समस्या या फिर पानी की कमी?
आंकड़े बताते हैं कि एएलएस से 1869 से अब तक दुनिया भर में 2.1 करोड़ लोगों की मौत हुई है जबकि इसी दौरान पीने का साफ पानी न होने की वजह से जो बीमारियां हुईं उससे 49.3 करोड़ लोगों की मौत हुई।
तो किसे बड़ी समस्या मानें? एएलएस को या फिर साफ पानी की कमी को?
पानी पर काम करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का अनुमान है कि दुनिया में 78.3 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी नहीं मिल पाता।
शायद अमेरिका और दूसरे विकसित देश जानबूझकर इस समस्या को समझना नहीं चाहते। लेकिन विकासशील देशों में एएलएस को समझे बिना जो कुछ हो रहा है वह सोशल मीडिया की सीमाओं का भी परिचायक है।