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मनमोहन के दामन तक कैसे पहुंची कोयले की कालिख?

Fri, 13 Mar 2015 03:15 PM IST
कृष्ण कुमार सिंह/अमर उजाला, दिल्ली
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कोल ब्लॉक आवंटन घोटाले की कालिख मिस्टर क्लीन की छवि वाले पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के दामन पर लगने के बाद कांग्रेस उन्हें बचाने के लिए पूरी तरह एकजुट हो गई है।
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मार्च, 2012 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) द्वारा कोल ब्लॉक के आवंटन में बरती गई अनियमितताओं के खुलासे के बाद से अब तक इस मामले में कई अहम मोड़ आए हैं।

शुरुआत में जांच का दायरा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल तक सीमित था जो बाद में बढ़कर एनडीए के शासनकाल तक पहुंच गया और, अंतत: सुप्रीम कोर्ट को 214 ब्लॉकों के आवंटन को रद्द करने का अहम फैसला करना पड़ा। एक नजर कोल ब्लॉक आवंटन से जुड़े घटनाक्रम पर।
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पहली बार कब हुआ खुलासा?
कोल ब्लॉक आवंटन में हुई अनियमितताओं का खुलासा पहली बार मार्च, 2012में कैग के ड्राफ्ट के जरिए हुआ था। तब सीवीसी ने मई, 2012 में सीबीआई से 194 ब्लॉक की जांच करने की सिफारिश की थी।

कैग ने कोयला ब्लॉक आवंटन से संबंधित अपनी विस्तूत रिपोर्ट 17 अगस्त, 2012 को संसद में पेश की जिसमें कहा गया था कि आवंटन के तरीके में पारदर्शिता नहीं बरतने, नियमों में फेरबदल किए जाने, मूल्यांकन प्रणाली में खामियां, कोयला संपन्न राज्यों के मंत्रियों एवं मुख्यमंत्रियों द्वारा निजी कंपनियों के लिए लाबिंग करने के कारण निजी कंपनियों को लाभ मिला और सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

कैग ने यह भी साफ किया कि कोयले के बाजार भाव और इसके उत्पादन में आने वाली लागत की कीमतों में जरूरत से ज्यादा का अंतर है। इसका मतलब था कि कंपनियों ने कोल ब्लॉक पाने के लिए काफी कम रकम चुकाई, जबकि बाजार भाव कई गुना अधिक था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने हाथ में लिया केस
सितंबर, 2012 में मामले की गंभीरता को देखकर सुप्रीम कोर्ट ने जांच की निगरानी अपने हाथ में ले ली और जांच का दायरा पूर्ववर्ती एनडीए शासन तक बढ़ा दिया। वहीं, 23 अप्रैल, 2013 को संसदीय समिति ने भी संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में वर्ष 1993 से 2010 तक हुए कोल ब्लॉक के सभी आवंटनों को गैरकानूनी करार दिया।

1993-2010 के बीच कुल 218 ब्लॉक आवंटित किए गए थे। इनमें 1993-96 में (पी.वी. नरसिम्हा राव सरकार के दौरान) पांच, 1996-97 में (एचडी देवगौड़ा सरकार के दौरान) चार, 1998-2004 में (अटल बिहारी सरकार के दौरान) 30 और २004-11 में (मनमोहन सिंह सरकार के दौरान) 179 थे। 24 सितंबर, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में न सिर्फ कैग के इन आवंटनों से सरकारी खजाने को हुए नुकसान के अनुमानों को सही ठहराया बल्कि 1993 से 2010 तक आवंटित किए गए 218 कोल ब्लॉकों में से चार को छोड़ बाकि का आवंटन रद्द कर दिया।

घोटाले की जद में आए पूर्व प्रधानमंत्री
यूपीए के शासनकाल में कोल ब्लॉक आवंटन के तहत बिड़ला की हिंडाल्को कंपनी को ओडिशा के तालाबीरा दो और तीन कोयला ब्लॉक आवंटित किए गए थे।

तब कोयला मंत्रालय का प्रभार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के पास था। सीबीआई ने अक्तूबर, 2013 में कुमार मंगलम बिड़ला, पूर्व कोयला सचिव पीसी पारेख, हिंडाल्को के दो अधिकारी शुभेंदु अमिताभ और डी भट्टाचार्य एवं अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी।

सीबीआई का आरोप है कि बिड़ला से मुलाकात के बाद पारेख ने स्क्रीनिंग कमेटी का निर्णय बदल दिया, जबकि कोल ब्लॉक आवंटन के लिए गठित स्क्रीनिंग कमेटी ने बिड़ला की कंपनी को आवंटन करने से इनकार कर दिया था।

कसता गया मनमोहन सिंह पर शिकंजा
इस मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की मुसीबतें तब बढ़ गईं जब 16 दिसंबर, 2014 को विशेष अदालत ने सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट खारिज करते हुए मामले में उनसे पूछताछ करने का निर्देश दिया। जनवरी, 2015 में सीबीआई की एक टीम द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से पूछताछ किए जाने की खबर आई। सिंह से हिंडाल्को कंपनी को कोयला खदान आवंटित किए जाने के बारे में सवाल पूछे गए थे।

कहा जा रहा है कि तलाबिरा-2 कोयला खदान को हिंडाल्को को आवंटित किए जाने के संदर्भ में उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला ने सात मई, 2005 और 17 जून, 2005 को तत्कालीन प्रधानमंत्री सिंह को पत्र लिखा था। सीबीआई ने ये पत्र प्राप्त होने के बाद कोयला मंत्रालय के साथ-साथ प्रधानमंत्री कार्यालय में हुई गतिविधियों के बारे में पूछताछ की थी।

इसी मामले में 21 जनवरी, 2015 को सीबीआई ने आदित्य बिड़ला समूह की कंपनी हिंडाल्को को वर्ष 2005 में तलाबिरा.2 कोयला खदान आवंटित किए जाने में बरती गई कथित अनियमितता को लेकर समूह के अध्यक्ष कुमार मंगलम बिड़ला से भी पूछताछ की।

घटनाक्रम पर एक नजर
सीबीआई ने शुरू की जांच
1 जून, 2012: सीबीआई ने केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की सिफारिश पर वर्ष 2006 और 2009 के बीच निजी कंपनियों को कोयला ब्लॉक आवंटन में हुई अनियमितताओं के आरोपों की प्रारंभिक जांच प्रीलिमनेरी इंक्वायरी (पीई) दर्ज कर शुरू की।

कोयले की कालिख
17 अगस्त, 2012 को कैग ने कोल ब्लॉक आवंटन पर अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की। रिपोर्ट के मुताबिक 2004 से 2009 के दौरान बगैर प्रतिस्पर्धी बोली के किए गए आवंटन से सरकारी खजाने को 1.86 लाख करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। खास बात यह है कि पांच वर्षों की इस अवधि में कोयला मंत्रालय प्रधानमंत्री के पास ही था।

संसदीय समिति ने आवंटन को गैरकानूनी बताया
कोल ब्लॉक आवंटन मामले में सीबीआई की जांच में दखल के आरोपों पर पहले से घिरी सरकार की परेशानी कोयला एवं इस्पात संबंधी संसद की स्थाई समिति ने और बढ़ा दी है जब 23 अप्रैल, 2013 को समिति ने संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में साल 1993 से साल 2008 तक हुए कोल ब्लॉक के सभी आवंटनों को गैरकानूनी करार दिया।

सीबीआई पिंजरे में बंद सरकारी तोता
8 मई, 2013 को सीबीआई जांच की प्रगति रिपोर्ट में सरकार के हस्तक्षेप पर कड़ी नाराजगी जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई पिंजरे में बंद ऐसा तोता बन गई है जो अपने मालिक की बोली बोलता है। यह ऐसी अनैतिक कहानी है जिसमें एक तोते के कई मालिक हैं।

1993 के बाद सभी कोयला ब्लॉकों के आवंटन अवैध
25 अगस्त, 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए वर्ष 1993 से 2010 के बीच किए गए सभी आवंटनों को गैरकानूनी और मनमानी करार दिया।

अदालत ने कहा कि ये आवंटन भारी अनियमितता, लापरवाही और बगैर विवेक के इस्तेमाल के किए गए। हालांकि तब शीर्ष अदालत ने आवंटनों को निरस्त नहीं किया बल्कि आवंटन रद्द करने पर आगे सुनवाई शुरू रखने को कहा।

214 कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने 24 सितंबर, 2014 को 1993 से 2010 के बीच आवंटित 218 में से 214 कोल ब्लॉकों का आवंटन रद्द कर दिया। हालांकि आवंटन रद्ïद करने से कोयले की कमी न हो जाएए इस वजह से सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला छह महीने तक स्थगित रखा।

मनमोहन सिंह को अदालत ने जारी किया समन
सीबीआई की विशेष अदालत ने 11 मार्च, 2015 को पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोयला ब्लॉक आवंटन से जुड़े एक मामले में बतौर आरोपी 8 अप्रैल को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी किया।
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