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उत्तराखंड में कितने लापता, 3 हजार या 11 हजार?

Tue, 02 Jul 2013 01:43 AM IST
नई दिल्ली/एजेंसी/ब्यूरो
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उत्तराखंड सरकार भले ही लापता लोगों की संख्या तीन हजार बता रही हो लेकिन यह आंकड़ा कहीं ज्यादा हो सकता है।
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के चेयरमैन एम शशिधर रेड्डी ने कहा कि जो एफआईआर दर्ज की गई हैं, उनके हिसाब से लापता लोगों की संख्या 3500 से 3700 के बीच है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक एजेंसी ने कुछ एनजीओ के साथ मिलकर बताया है कि लापता लोगों की संख्या 11 हजार के ऊपर हो सकती है।

कई लोगों को निकालना बाकी
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के वाइस चेयरमैन एम शशिधर रेड्डी ने बताया कि रविवार तक मिले आंकड़ों के मुताबिक, बदरीनाथ से 1350 लोगों को निकाला जा चुका है। इनमें से 800 को हेलीकॉप्टरों से और 550 लोगों को सड़क मार्ग के जरिए निकाला गया लेकिन अभी कुछ स्थानीय लोगों जैसे दुकानदारों और आश्रम में रह रहे लोगों को निकाला जा रहा है।
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उन्होंने बताया कि आपदा में मरने वालों की संख्या 580 है जबकि एनडीआरएफ ने केदारनाथ से 5,634 लोगों को सुरक्षित बचा लिया है। इस तरह से आपदा प्रभावित 10,8253 लोगों को अभी तक सुरक्षित निकाला जा चुका है।

580 मृत घोषित, तो कहां हैं शव?

रेड्डी ने बताया कि लापता लोगों के बारे में दर्ज एफआईआर के मुताबिक यह आंकड़ा 3500-3700 है। केदारनाथ और रामबाड़ा इलाके में ज्यादा मौतें हुई हैं।

हालांकि कुछ एनजीओ के साथ तैयार की गई संयुक्त राष्ट्र एजेंसी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंकड़ा 11 हजार के पार हो सकता है।

बताया 300 फंसे, निकाले 1101, 500 बाकी
उत्तराखंड में आसमान से बरसी आफत के बाद सेना के बचाव अभियान की सूचना देने के मामले में भी प्रशासन के स्तर पर समन्वय का घोर अभाव दिख रहा है।

रविवार को बताया गया था कि बदरीनाथ धाम से लगभग डेढ़ हजार लोग निकाले गए। जिला आपदा प्रबंधन केंद्र की ओर से कहा गया कि अब केवल तीन सौ लोग फंसे हैं।

राहत का भंडार, फिर क्यों हैं लोग भूखे-प्यासे?

लेकिन सोमवार को जिला सूचना अधिकारी बीसी तिवारी ने बताया कि हेलीकॉप्टर से 476 और 625 तीर्थयात्री पैदल मार्ग से निकाले गए।

धाम में अब भी (सोमवार शाम के बाद) करीब 150 तीर्थयात्री और 350 स्थानीय निवासी हैं। इन्हें मंगलवार को निकाला जाएगा।

गांवों तक पहुंचें कैसे, संपर्क मार्ग ही नहीं
16-17 जून के बाद टिहरी जिले की 245 सड़कें बंद हो गई थीं। इसके बाद कई गांवों में अनाज का संकट गहरा गया। जिला पूर्ति विभाग ने जिले के सभी 26 गोदामों में पर्याप्त रसद पहुंचा दिया। अब सवाल यह है कि यह सामग्री गांवों तक पहुंचेगी कैसे। 95 संपर्क मार्ग अब भी बंद हैं।

जाने लगे बाहर से आए डॉक्टर
विनाशकारी प्रलय के शिकार गांवों में घायलों और बीमारों का सहारा बस भगवान ही रह गया है। डॉक्टरों के करीब 50 फीसदी पद पहले से ही खाली चल रहे हैं, अब दूसरे राज्यों और अस्पतालों से आए चिकित्सक दल लौटने लगे हैं, जिससे दिक्कतें और बढ़ जाएंगी। असल चुनौती जलप्रलय की चपेट में आए चार जनपदों में मुख्यधारा से कटे 165 गांवों तक डॉक्टरों को पहुंचाने की है।

क्या हो रहा है
--नेताओं और पार्टियों में पीड़ितों की मदद करने का श्रेय लेने की होड़ मची रही।
--राजनीतिक दल एक-दूसरे पर सियासत करने के आरोप लगा रहे।
--हर राज्य सिर्फ अपने लोगों को निकालने की बात करता रहा।
--आपदा की घड़ी में उत्तराखंड सरकार को बर्खास्त करने की मांग की जा रही।

क्या होना चाहिए था
--राजनीतिक दल शवों पर सियासत करने के बजाय मिलकर काम करते तो उत्तराखंड में राहत कार्यों की स्थिति कहीं बेहतर हो सकती थी।
--आपदा के बाद एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जा सकती थी, जिसमें फंसे लोगों को निकालने और राहत कार्यों पर चर्चा हो सकती थी।
--राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को आपदा प्रभावित इलाकों में राहत के लिए सुनियोजित तरीके से भेज सकते थे।
--इसे किसी राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की आपदा मानकर कदम उठाए जा सकते थे।

जापान ने पेश किया था बेहतरीन उदाहरण
जापान में भी 11 मार्च 2011 को भयावह सुनामी आई थी, समुद्र में 40 मीटर तक ऊपर ऊंची उठी लहरों ने न केवल फुकुशिमा परमाणु प्लांट को भारी नुकसान पहुंचाया था, बल्कि जापान के उत्तर पूर्व के तटीय इलाकों में जमकर कहर भी बरपाया था।
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इसमें 15 हजार से ज्यादा लोग मारे गए। नुकसान इतना ज्यादा हुआ कि इसे आर्थिक तौर पर दुनिया की अब तक की सबसे बड़ी प्राकृतिक आपदा माना जाता है। लेकिन जापान ने न केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छा शक्ति का परिचय दिया, बल्कि पुनर्निर्माण के काम को बखूबी अंजाम भी दे दिया।
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