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देश के लिए कितना कारगर गुजरात मॉडल?

Tue, 06 May 2014 08:23 AM IST
समीर हाशमी/बीबीसी न्यूज, गुजरात
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यह इमारत एकदम नई है और इसकी दीवारों पर लगा चमकीला हरा रंग अभी सूखा भी नहीं है। यह गुजरात में बने एक बिजलीघर का नया हिस्सा है, बिजली की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए इसका विस्तार किया गया है।
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भारत के प्रमुख व्यापारिक घरानों में से एक, एस्सार ने कोयले से चलने वाले इस बिजलीघर को दो साल पहले बनाया था। इसमें बनने वाली बिजली गुजरात सरकार को बेची जाती है, जिसकी सप्लाई राज्य के कई हिस्सों में होती है।

बिजली उत्पादन के लिए इस संयंत्र का और विस्तार किया जाना है। इस कारखाने के प्रमुख केबी माकाडिया कहते हैं, ''अवसर अपार हैं।''

बुनियादी सुविधाओं में सुधार

पिछले दशक में गुजरात में तेज़ आर्थिक विकास हुआ है। भारी औद्योगीकरण की वजह से गुजरात की अर्थव्यवस्था 2004 से 2012 के बीच औसतन 10 फ़ीसदी प्रति वर्ष की दर से बढ़ी है। यह राष्ट्रीय औसत से 8.25 से अधिक है।

एक ऐसे देश में जहां बिजली कटौती आम बात है, वहां गुजरात सरकार अपने 18 हज़ार गांवों में 24 घंटे बिजली आपूर्ति का दावा करती है। उसने और भी बुनियादी सुविधाओं में निवेश किया है, सैकड़ों मील सड़कें बनी हैं और बंदरगाह भी बने हैं।

राज्य के विकास के साथ-साथ लालफीताशाही भी कम हुई है, इस वजह से गुजरात की 'बिज़नेस फ्रेंडली' छवि मज़बूत हुई है। यहां एस्सार के अलावा कई अन्य देसी-विदेशी कंपनियां भी आई हैं, इनमें टाटा मोटर्स, मारुति सुजुकी और फ़ोर्ड शामिल हैं।

नरेंद्र मोदी की छवि

मोदी 2001 से राज्य के मुख्यमंत्री हैं, उन्होंने अपनी छवि एक कुशल प्रशासक की बनाई है और राज्य में व्यापार के अनुकूल माहौल बनाने पर ध्यान दिया है। यही वजह है कि नरेंद्र मोदी आज भारतीय कॉरपोरेट जगत के प्रिय बने हुए हैं।

माकाडिया कहते हैं, '' पिछले 10-12 सालों में गुजरात को एक सुनियोजित तरीके से संचालित किया गया है। यह काम नरेंद्र मोदी और उनकी टीम करती है।''

टाटा समूह के पूर्व चेयरमैन रतन टाटा, रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी जैसे प्रमुख उद्योगपतियों ने गुजरात में किए काम के लिए नरेंद्र मोदी की तारीफ की है।

पिछले साल महिंद्रा समूह के अध्यक्ष आनंद महिंद्रा ने कहा था, ''अब वह समय आ गया है जब हमें देखने को मिलेगा कि गुजरात मॉडल चीन में भी दोहराया जा रहा है।''

आर्थिक विकास बनाम मानव विकास

लेकिन विकास के इस सांचे को देश के बाहर ले जाने से पहले मोदी ने गुजरात के विकास मॉडल को लोकसभा चुनाव के केंद्र में ला दिया।

वह मतदाताओं को यह कहकर लुभा रहे हैं कि अगर वो सत्ता में आते हैं तो, वो इस मॉडल को पूरे देश में दोहराएंगे, एक ऐसे देश में जहां पिछले कुछ सालों में विकास दर पांच फ़ीसदी से भी कम बनी हुई है लेकिन इससे सब लोग सहमत नहीं हैं।

एस्सार के बिजलीघर से दो घंटे की दूरी पर भानवाड तहसील में आरिया का गांव है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि ग्यारह महीने की आरिया कुपोषित है। उसका वजन अपनी उम्र के बच्चों से आधा है। उसके पिता एक ड्राइवर हैं, जो महीने में छह हज़ार रुपए कमाते हैं जो कि पांच लोगों के उनके परिवार के लिए पर्याप्त नहीं है।

आरिया को देश में बच्चों की भूख और कुपोषण की समस्या से मुक़ाबला करने के लिए चलाई जा रही पूरक पोषण कार्यक्रम के तहत थोड़ा खाना मिलता है, लेकिन उसके पिता कहते हैं उसे और खाने की जरूरत है। आरिया की मां भावू बेन कहती है, ''मैं उसे फल खिलाती हूं, जो कि सरकारी केंद्र से मिलता है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है।''

विकास मॉडल का सच

साल 2013 में आई एक आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक़ गुजरात में हर तीसरे बच्चे का वजन कम है, यह राष्ट्रीय औसत से थोड़ा ही बेहतर है। इस रिपोर्ट में पूरक पोषण कार्यक्रम के ख़राब क्रियान्वयन के लिए गुजरात सरकार की आलोचना की गई थी। महिलाओं के स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सामाजिक सूचकांकों पर भी गुजरात का प्रदर्शन ख़राब है।

सरकार की ओर से नियुक्त एक समिति की रिपोर्ट में मानव विकास के आधार पर गुजरात को कम विकसित राज्य के रूप में वर्गीकृत किया गया है।

इस समिति ने पाया कि गुजरात की तुलना में आर्थिक रूप से कई कमजोर राज्य मानव विकास सूचकांक में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।

नरेंद्र मोदी के विरोधी इसका उपयोग गुजरात के विकास मॉडल को अमीर समर्थक और ग़रीब विरोधी बताने के लिए करते हैं।

अर्थशास्त्रियों की अलग राय

अब सवाल यह उठता है कि क्या गुजरात के विकास मॉडल को बहुत अधिक सफलता मिली है, जैसा कि नरेंद्र मोदी और उनके समर्थक दावा कर रहे हैं या वह केवल एक मिथक है, जैसा की उनके विरोधी बता रहे हैं? और क्या भारत की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद करेगी।

इस सवाल पर राजनीतिक तबके की ही तरह अर्थशास्त्रियों की राय बंटी हुई है। नई दिल्ली स्थित ऑक्सस इंवेस्टमेंट के अध्यक्ष सुरजीत भल्ला कहते हैं, ''वह इस बात का कोई कारण नहीं देखते हैं कि गुजरात का विकास मॉडल भारत में काम नहीं करेगा।''

वो कहते हैं, '' गुजरात मॉडल क्रियान्वयन के मामले में कामयाब रहा है और निवेश को आकर्षित करने में सफल रहा है, जो कि विकास को बढ़ावा देने के लिए ज़रूरी है।''

इस मॉडल के समर्थक भल्ला जैसे अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि कमाई बढ़ाने के लिए भारत में निवेश के माहौल को पुनर्जीवित करने की जरूरत है, जिसका उपयोग मानव विकास में किया जा सकता है।
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पुरानी आर्थिक नीतियों का क्या होगा?

लेकिन नई दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र पढ़ाने वाले प्रभात पटनायक का मानना है कि उद्योगों का आकर्षित करने के लिए गुजरात की रणनीति उन्हें सार्वजनिक संसाधन उपलब्ध कराना है, इससे शिक्षा, स्वास्थ्य और ग़रीबों के लिए बहुत कम पैसा बच जाता है।

पटनायक जैसे बहुत से अर्थशास्त्रियों का कहना है कि गुजरात की तेज़ आर्थिक विकास दर असाधारण रूप से अकेली नहीं है, पिछले दशक में महाराष्ट्र, बिहार और केरल जैसे राज्यों ने भी तेज़ी से विकास किया है।

वो कहते हैं, ''गुजरात मॉडल भारत में मानव विकास सूचकांकों को और बिगाड़ते हुए ऊंची विकास दर लेकर आएगा।'' जैसी कि संभावना है, अगर नरेंद्र मोदी अगले प्रधानमंत्री बनते हैं तो इस बात पर बहस तेज़ हो गई है कि क्या भारत की पुरानी आर्थिक नीतियों को खारिज कर दिया जाएगा?
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