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जदयू गई तो कैसे सिर चढ़ेगी एनडीए के विस्तार की योजना?

Sat, 15 Jun 2013 03:54 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
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भाजपा-जदयू का 17 साल पुराना रिश्ता टूटने के बाद राजग का कुनबा महज पांच दलों तक सिमट जाएगा।
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दो महीने पहले भाजपा ने दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में एनडीए के विस्तार की योजना बनाई थी लेकिन जदयू के फैसले बाद भाजपा की योजना पर पानी फिर गया।

माना जा रहा है कि जदयू के फैसले से पार्टी के नवनियुक्त चुनाव समिति प्रमुख नरेंद्र मोदी की महात्वाकांक्षाओं को भी तगड़ा झटका लगा है।

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लोकसभा में एनडीए के सदस्यों की संख्या सिमट कर 134 पर आ जाएगी।

गठबंधन में शामिल दलों में भाजपा के पास 117, शिवसेना के पास 11, अकाली दल के पास 4 सीटें, हजकां और नगालैंड पीपल्स फ्रंट के पास एक-एक सीटें हैं।

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एनडीए के बचे हुए सहयोगियों पर गौर करें तो 2014 लोकसभा चुनाव के बाद गठबंधन के लिए 272 का आंकड़ा जुटाना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।

भाजपा के हिस्से राज्य

272 का आंकड़ा जुटाने के लिए भाजपा ने लोकसभा चुनाव में कम से कम 180 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है।

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भाजपा का मानना है कि यदि पार्टी 180 से 200 सीटें जीतने में कामयाब रही तो उनके पुराने सहयोगी और तीसरे मोर्चे की वकालत कर रहे दल एनडीए में शामिल हो जाएंगे।
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हालांकि बदले हालात में भाजपा का ये दावा संदेह पैदा करता है। फिलहाल भाजपा गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गोवा में ही शासन में है। पंजाब में भाजपा और अकाली दल का गठबंधन सत्ता में है।

इन राज्यों में मध्य प्रदेश में लोकसभा की 29, गुजरात में 26 और छत्तीसगढ़ में 11 सीटें हैं। जबकि पंजाब में 13 सीटे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मध्यप्रदेश में 16, गुजरात में 15 और छत्तीसगढ़ में 10 सीटें पाई थीं।

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गुजरात में पार्टी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटी है, जबकि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नवंबर में विधानसभा चुनाव होने है और माना जा रहा है कि पार्टी इन राज्यों में बेहतर स्थिति में है।

बड़े राज्यों में भाजपा

लेकिन लोकसभा सीटों के लिहाज से बड़े राज्यों में भाजपा अब भी संघर्ष की स्थिति में है। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें है और पिछले चुनाव में भाजपा को 10 सीटें मिलीं थीं।

भाजपा ने यूपी में वापसी के लिए नरेंद्र मोदी के करीबी अमित शाह को चुनाव प्रभारी बनाकर भेजा है। जानकारों की मानें तो शाह संगठनिक रूप से लचर भाजपा में जान ता फूंक सकते हैं लेकिन सपा और बसपा जैसी पार्टियों के बीच वो अपना वोट प्रतिशत बढ़ा पाएंगे, ये दावा करना मुश्किल है।

पिछले आम चुनाव में भाजपा को 17 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 90 के दशक यही पार्टी 30 फीसदी वोटों के साथ यहां 50 से अधिक सीटें जीत चुकी है।

महाराष्ट्र में 48 सीटें है और राज्य में भाजपा शिवसेना गठबंधन हैं। पिछले चुनाव में भाजपा ने यहां 9 और शिवसेना ने 11 सीटें जीती थीं।

2009 में यहां कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन और भाजपा-शिवसेना गठबंधन के बीच मुकाबला था। लेकिन इस बार राज ठाकरे की एमएनएस भी दावेदारी में है।

विश्लेषकों की मानें तो इस राज्य में सत्ताधारी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन के खिलाफ 'एंटी-इंनकबेंसी फैक्टर' का फायदा मिल सकता है।

हालांकि एमएनएस जैसी पार्टी के कारण बंटे हुए विपक्ष का फायदा सत्ताधारियों को भी मिल सकता है।

दूसरे राज्यों में भाजपा

आशंका है कि दो दिनों बाद बिहार की सत्ता में शामिल भाजपा विपक्ष का हिस्सा बन जाएगी।
पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को वहां 13 फीसदी वोटों के साथ 12 सीटें मिलीं थीं। जदयू के हिस्से 24 फीसदी वोट और 20 सीटें आई थी।

जदयू- भाजपा गठबंधन टूटने से राजग की विस्तार योजना को तो झटका लगा ही है, राज्य में मुकाबला भी बहुकोणीय हो गया है।

नए हालात में लाजिमी सवाल ये है कि भाजपा राजग विस्तार के लिए अब किन दलों की ओर देखेगी? विभिन्न दलों की मौजूदा राय पर गौर करें तो भाजपा के लिए हालात विषम हैं।
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राजग की पुराने सहयोगी बीजू जनता दल, तृणमूल कांग्रेस और तेलुगू देशम पार्टी तीसरे मोर्चे की जुगत में लगे हैं।

बीजद अध्यक्ष और ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी, दोनों को ही खारिज कर चुके हैं और तीसरे मोर्चें के विचार को आगे बढ़ाने में सबसे आगे हैं।

विश्लेषकों की मानें तो पुराने सहयोगियों मे नेशनल कांफ्रेंस के भाजपा के साथ आने की संभावना कम ही है।

खुद उमर अब्दुल्ला भी कह चुके हैं कि राजग में शामिल होना उनकी बहुत बड़ी भूल थी। ऐसे में नेशनल कॉन्फ्रेंस राजग में लौटेगी कि नहीं, ये कहना मुश्किल है।
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