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शाह संग डीपी यादव,जानिए पीछे की कहानी

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हरियाणा के अंबाला में पश्चिमी यूपी के बाहुबली नेता डीपी यादव, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के साथ मंच पर दिखे तो चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। कयास लगाए जाने लगे कि वह दोबारा से बीजेपी में शामिल होने वाले हैं।
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हालांकि डीपी यादव ने खुद इस बात का खंडन कर दिया है लेकिन चर्चाएं बरकरार हैं। माना जा रहा है कि अपनी खोई जमीन तलाश रहे डीपी अब बीजेपी की शरण में हैं।

खबर के मुताबिक मंगलवार को हरियाणा के अंबाला में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की रैली थी। इस रैली में मंच पर अमित शाह के साथ डीपी यादव भी दिखाई दिए। सवाल उठा कि क्या डीपी अब बीजेपी में शामिल होने वाले हैं?

इस बाबत जब डीपी से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि,"मैं अपनी पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष हूं और ईमानदार लोगों का प्रचार कर रहा हूं। जिस ईमानदार उम्मीदवार को मेरी मदद की जरूरत होगी मैं वहा जाऊंगा।"
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डीपी यादव: पुराना है दल बदल का इतिहास

छात्र राजनीति से अपनी धमक बनाने वाले डीपी यादव सपा और बसपा जैसे पार्टियों में भी रह चुके हैं और बीजेपी में भी। वह चार बार विधायक रह चुके हैं और एक बार लोकसभा सदस्य भी रह चुके हैं। वह राज्यसभा सदस्य भी रह चुके हैं।

2004 में भी डीपी बीजेपी में शामिल हुए थे लेकिन पार्टी में विरोध के कारण उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था। 2009 में वह बसपा के टिकट पर बदायूं से लोकसभा का चुनाव लड़े थे लेकिन सपा के धर्मेंद्र यादव ने उन्हें परिजित किया था।

2012 विधानसभा चुनाव से पहले बसपा ने छवि सुधारने की नीति के तहत उनका टिकट काट दिया तो नाराजगी में वह सपा के मंच पर पहुंच गए, माना जा रहा था कि अब वह लाल टोपी पहन लेंगे लेकिन अखिलेश उन्हें पार्टी में ना लेने की जिद पर अड़ गए थे।

फिलहाल वह राष्ट्रीय परिवर्तन दल नाम की एक पार्टी के अध्यक्ष हैं। यह पार्टी खुद उन्होंने 2007 में बनाई थी। पश्चिमी यूपी के गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बागपत, मेरठ, बुलंदशहर और बदायूं में उनका खासा जनाधार है।

डीपी यादव: शराब माफिया से सत्ताई शिखर तक

डीपी यादव का पूरा नाम धर्म पाल यादव है। डीपी यादव का जन्म गौतमबुद्धनगर के सरफाबाद में हुआ था। राजनीति और खेलों का चस्का इन्हें छात्र जीवन से ही था।

शराब के कारोबार से उन्होंने दौलत कमाई और फिर राजनीति में कदम रखा। आरोप लगाए जाते हैं कि इनकी शराब ने काफी लोगों की जान भी ले ली थी। पॉन्टी चड्डा से पहले वाइन किंग का तमगा उनके पास ही था।

1989 में वो पहली मर्तबा विधायक बने। कहने को वो पंचायती राज मंत्री थे लेकिन जानने वाले जानते हैं कि उनको मुलायम सिंह का खासमखास माना जाता था, मिनी सीएम कहा जाता था। डीपी यादव का दबदबा इतना था कि प्रशासनिक अफसर उनके नाम से ही कांपते थे।

1991 और 1993 में भी जलवा कायम रहा और विधायकी का झंड़ा लहराता रहा। डीपी 1996 में लोकसभा के सदस्य भी रहे। 2004 में वो बीजेपी में शामिल हो गए थे और बीजेपी ने उन्हें राज्यसभा भेजा था।
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नीतीश कटारा हत्याकांड: खत्म हुआ डीपी का जलवा

फरवरी 2002 में डीपी के दामन पर जो दाग लगा वो कभी धुल नहीं पाया। नीतीश कटारा नाम के एक युवक का कत्ल हुआ और आरोप लगा डीपी के बेटे और भतीजे पर।

माना जाता है कि डीपी की बेटी भारती और नीतीश का अफेयर था जिससे खफा डीपी के बेटे विकास यादव और भतीजे विशाल ने उसका कत्ल कर दिया। बुलंदशहर के खुर्जा में नीतीश की लाश मिली थी।

अचानक डीपी की बेटी भारती इंग्लैंड चली गई और 2006 में वापस आईं। इस मामले में विकास और विशाल को उम्र कैद की सजा सुनाई गई। माना जाता है कि डीपी ने गवाहों को प्रभावित करने की कोशिश की।

इस केस के बाद से डीपी का सूरज अस्त होता चला गया। किसी वक्त यूपी की राजनीति का सितारा रहे डीपी फिलहाल अपनी साख को बचाए रखने के लिए जूझ रहे हैं।
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