हाल ही में संशोधित शत्रु संपत्ति अध्यादेश 2016 को राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद करीब 2050 संपत्तियों का मालिकाना हक अब भारत सरकार को मिल गया है। 1968 के शत्रु संपत्ति अधिनियम के मुताबिक ऐसी संपत्तियों की संरक्षक भारत सरकार होती है।
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उत्तर प्रदेश के राजा महमूदाबाद के नाम से जाने वाले मोहम्मद आमीर मोहम्मद खान के साथ ही वो भारतीय नागरिक जिनके रिश्तेदार बंटवारे के बाद या फिर 1965 या 1971 लड़ाई के बाद भारत छोड़ पाकिस्तान के नागरिक हो गए थे, उनकी संपत्ति 'शत्रु' संपत्ति के दायरे में आ गई है।
अब वे ऐसी संपत्ति को न तो बेच सकेंगे और न किसी को दे पाएंगे। संशोधित अध्यादेश के तहत यह मालिकाना हक 1968 से माना जाएगा, जब ये कानून बना था। पाकिस्तान से 1965 में हुई लड़ाई के बाद 1968 में शत्रु संपत्ति (संरक्षण एवं पंजीकरण) अधिनियम पारित हुआ था। इस अधिनियम के अनुसार जो लोग बंटवारे या 1965 और 1971 की लड़ाई के बाद पाकिस्तान चले गए और वहां की नागरिकता ले ली थी, उनकी सारी अचल संपत्ति शत्रु संपत्ति घोषित कर दी गई।
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'शत्रु संपत्ति संशोधित अध्यादेश 2016' से खत्म हुआ हक
इस अधिनियम के प्रावधानों को राजा महमूदाबाद ने अदालत में चुनौती दी थी और सुप्रीम कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया था। लेकिन 'शत्रु संपत्ति संशोधित अध्यादेश 2016' के लागू होने और शत्रु नागरिक की नई परिभाषा के बाद विरासत में मिली ऐसी संपत्तियों पर से भारतीय नागरिकों का मालिकाना हक खत्म हो गया है।
लखनऊ, मुंबई और हैदराबाद समेत कई जगहों पर शत्रु संपत्ति का मालिकाना हक अब संरक्षक यानी भारत सरकार को मिल गया है। राजा महमूदाबाद के पिता 1957 में पाकिस्तान चले गए थे। नए अध्यादेश के बाद उनकी लखनऊ, सीतापुर और नैनीताल स्थित करोड़ों की संपत्ति पर एक बार फिर मालिकाना हक कस्टोडियन (संरक्षक) का हो गया है।
महमूदाबाद लखनऊ के नजदीक सीतापुर जिले की बड़ी तहसील है। लखनऊ में राजा महमूदाबाद की संपत्तियों में बटलर पैलेस, महमूदाबाद हाउस और हजरतगंज में कई दुकानें हैं। वहीं सीतापुर के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक और मुख्य चिकित्सा अधिकारी के आवास भी राजा महमूदाबाद की संपत्तियों का हिस्सा हैं। राजा महमूदाबाद की ऐसी संपत्तियों की कुल संख्या 936 है।
'ये मौलिक अधिकार का हनन'
1968 के शत्रु संपत्ति अधिनियम के अंतर्गत ऐसी संपत्तियों की संरक्षक सरकार होती है। 1973 में अपने पिता की मृत्यु के बाद राजा महमूदाबाद, अवध भूसंपत्ति अधिनियम 1869 के तहत उसके वारिस हुए और उन संपत्तियों पर अपना अधिकार मांगा। लंबी मुकदमेबाजी के बाद 2005 में राजा महमूदाबाद सुप्रीम कोर्ट में अपनी और अन्य ऐसी संपत्तियों से 'शत्रु' शब्द हटवाने में सफल हुए जिसके बाद उनको उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के नैनीताल की अपनी संपत्ति पर मालिकाना हक मिला।
राजा महमूदाबाद कहते हैं, “इस लड़ाई में वो अकेले नहीं हैं और कई ऐसे हैं जो इस अध्यादेश के बाद अपनी जायदाद पर मालिकाना हक खोने से अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक हो जाएंगे।" आमीर मोहम्मद खान के बेटे अली खान कहते हैं कि ये मौलिक अधिकार का हनन है। अली खान कहते हैं, "अध्यादेश तो आपात स्थिति में लाया जाता है। ऐसी कौन सी आपात स्थिति थी कि अध्यादेश का सहारा लेना पड़ा।"
उत्तर प्रदेश शासन में प्रमुख राजस्व सचिव, सुरेश चंद्रा ने इस पर कुछ भी कहने से मना कर दिया। उनका कहना था, "अभी तक हमने इसके बारे में सिर्फ अखबारों में पढ़ा है, जब तक हमारे पास अध्यादेश की कॉपी नहीं मिल जाती हम इस पर कुछ नहीं कह सकते।"
लखनऊ के हजरतगंज स्थित एक शोरूम के मालिक संदीप कोहली, जो सुप्रीम कोर्ट में राजा महमूदाबाद के दायर मुकदमे में प्रतिवादी नंबर पांच हैं, इस अध्यादेश से काफी उत्साहित हैं।
उनका शोरूम राजा महमूदाबाद की जायदाद का हिस्सा है। संदीप कोहली कहते हैं कि 2010 में भी अध्यादेश आया था और उस पर संसद में बिल पारित होना था जो नहीं हो सका था। उनको आशा है कि इस बार बिल पारित हो जाएगा। राजा महमूदाबाद का आरोप है कि इस कानून के पीछे किसी की गलत मंशा है।
वह कहते हैं, "मुंबई में करोड़ों की शत्रु संपत्ति को कुछ लाख में बेच दिया गया था।"पाकिस्तान से 1965 में हुई लड़ाई के बाद शत्रु संपत्ति (संरक्षण एवं पंजीकरण) आदेश पारित हुआ था। उसके बाद पहली बार उन भारतीय नागरिकों को संपत्ति के आधार पर शत्रु की श्रेणी में रखा गया, जिनके पूर्वज किसी ‘शत्रु’राष्ट्र के नागरिक रहे हों। यह कानून केवल उनकी संपत्ति को लेकर है और इससे उनकी भारतीय नागरिकता पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है।